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मातमपुर्सी के दौरान

शनिवार, 1 नवंबर 2008

मंत्रोच्चार,
गूंज रहे है/
वातावरण हवन से शुद्ध हो
सुवासित महक रहा है/
सूतक छूट रहा है
कनाते लगी है, टेंट तना है
पंडि़त भोज ले रहे है
दुःख(जितना भी, जो भी रहा हो) दूर हो रहा है

लोग,
धीर-धीरे आ रहे है
कुछ मातमपुर्सी होती है/
कुछ रोना-धोना
फ़िर बच्चे,
साबित करने लगे में लगे है
अपने आप को
अपनी सेवा का बखान करते
हर आने वालों से
किसने क्या किया/ कौन अस्पताल में रुका
पैसा कितना खर्च हुआ/कितने दिन लगे
तकरीबन, हर बारीक से बारीक
जानकारी परोसी जा रही है करीने से
गोया अम्माँ का जाना ना हुआ
कोई ईवेंट किया हो आर्गेनाईज

वहां,
जो भी मौजूद है
सभी के पास अपने अपने सवाल है
किसी को कितनी देर और लगेगी
किसी को अपने दु:ख सुनाने का मौका नही मिला है
किसी को प्रापर्टी और वसियतनामा तलाशना है
किसी को कार्यक्र्म जल्दी निपटाना है
किसी को अपने घर की फ़िक्र ने जकड़ रखा है
भोजन चल रहा है/
बातें चल रही है/
नेग-टीका हो रहा है/
अम्माँ,
तस्वीर से झांकती इंतजा़र कर रही है
अपनी बारी का कि
कब कोई बना देगा दीवार का हिस्सा उन्हें
कम से कम
बंटवारे तक या यादों के ताजा रहने तक
फ़िर भुला दी जायेगीं
धीरे-धीरे
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मुकेश कुमार तिवारी / दिनांक : २९-ऑक्टोबर-२००८ / समय : दोपहर ०१:३०

1 comment

अद्भुत प्रवाह है आपकी लेखनी का तिवारी जी बहुत सूक्ष्म अवलोकन करते हैं आप और उसको पिरो देते है शब्दों के मोतियों से

2 नवंबर 2008 को 10:07 am