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कविता : धरती के इस छोर से.........

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

आकाश ,
तुम एक चुनौती ही रहे मेरे लिये
मैनें अपनी ऊँचाईयों को पहचाना
तुम्हारे होने से
और
हमारे फासले के बीच
क्षितिज से लगाकर व्योम तक
मैनें अपनी साँसे भर दी
और गौण हो गया

तुम्हारे साये में
मैनें लिक्खी थी जो कहानियाँ
वो किसी उपन्यास में बदलने के पहले ही
खत्म हो गयी
चौराहों पर कानाफूसी में
और
तुम अजेय बने रहे

तुम,
अपना सूनापन
मेरी साँसों में भर
खुद हँस लेते हो
मेरी नाकामियों पर
और
मुझे तलाशना होता है
अपने वुजूद को
धरती के इस छोर से उस छोर तक
फिर तुम्हारे विस्तार में
जहाँ शुभ्र चटक रंग वालों बादलों के बाद
कोई जगह नही बचती
मेरे लिये

आकाश,
तुम कभी मुझे लगे
कि जैसे किसीने
मेरे सिर पर खींच दी हो
सीमारेखा
या बाँध ली हो
मेरी ऊँचाईयों को
और हमारे बीच ठूंस दिया हो
जिम्मेदारियों को लानतों में बदलकर
और तुम मोहरा भर बने रहे
इस साजिश में
मेरे खिलाफ़
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 30-ऑक्टोबर-2010 / समय : 01:00 रात्रि / सी.एच.एल.-अपोलो हास्पिटल, इन्दौर

कविता : धरा, आकाश और वायु

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

कभी,
सोचता हूँ कि
तुम्हें कुछ और नाम दूँ
शायद धरा
लेकिन तुम जितना सह लेती हो
अनकहे रिश्तों का दर्द /
रीते मन में सालती हो टीस /
तुम धरा तो नही हो सकती


सोचता हूँ,
तुम्हें पुकारू आकाश कभी
लेकिन देखता हूँ
तुम्हारी आँखों में
सितारों से कहीं ज्यादा आँसू हैं /
दामन में इतनी सिलवटें कि
दामिनी गुम हो जाये कहीं अपनी चमक खो कर
तुम आकाश तो नही हो सकती
जो इतराता है
अपने मुट्ठी भर सितारों पर
या चाँद के एक टुकड़े पर


सोचता हूँ,
तुम्हें वायु का नाम दूँ
तुम घुली रहती हो मेरे ख्यालों में
किसी भी आकार में ढली हुई
लेकिन तुम
अपने साथ केवल पराग ही नही ले जाती हो
हवा की तरह
और छॊड़ देती हो अपने हाल पर
तुम अपने संग लिये जाती हो
संस्कृति / संस्कारों की बेल
और पोषती हो उसे
तिल-तिल सूखते हुये
नही,
तुम वायु भी नही हो सकती


मैं,
सोचता हूँ
किसी दिन शायद तुम्हें दे पाऊं
कोई नाम
एकदम जुदा सा
जो तुम्हें परिभाषित करता हो
जैसा मैं देखता हूँ
मैं,
तुम पर नही थोपना चाहता
कोई पहचान
चाहे फिर वो मेरे नाम की ही क्यों न हो
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 03-अक्टोबर / समय : 09:30 रात्रि / घर

कविता : उगती दीवारों के बीच

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

कुछ,
पता नही चलता कि
कब तुम नींव से बदले स्तंभ में
फिर दीवारों में वक्त के साथ
और
फिर तुम्हारी उपयोगिता पर ही
उठने लगे सवाल
नये रास्तों के लिये


रास्ते,
जिन पर न जाने
कितने लोगों ने पायी होंगी मंजिलें
वक्त के साथ
दिशाहीन हो जाते हैं /
जिनके सिरे खत्म नही होते कहीं पर /
या कहीं खुलते नही


तब,
जमीन में होने लगती है
हलचल
पहले नींव बदलती है स्तंभों नें
फिर स्तंभ दीवारों में
और
दीवारें कुर्बान होने लगती हैं
नये रास्तों के लिये
भले ही कुछ दूर के लिये ही सही
रास्ता बनता तो है
जिसके सिरे पर फिर से
दीवारें उगने लगी हैं
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०८-सितम्बर-२०१० / समय : २:१५ दोपहर

गज़ल : कोई मुझसा ही मुझे ढूंढता होगा

शनिवार, 11 सितंबर 2010

आईना खुदही हैरां होता होगा
वो मुझे जब भी देखता होगा

शक्ल गुम हो गई हैं कहीं भीड़ में
कोई मुझसा ही, मुझे ढूंढता होगा

दफ़न होता रहा जो हर करवट पे
सलवटों में दर्ज फसाना पढ़ता होगा

ढल चुकी ख्वाब में दिन की नाकामियाँ
सोते हुये मेरे साथ कोई जागता होगा

वुजूद गुम हो गया है गर्दिश में
अजायब सा जहाँ मुझे देखता होगा
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०३-अगस्त-२०१० / समय : ०५:५० सायँ / घर

कविता : वैतरणी के पार

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

आग / पानी / हवा /
मिट्टी और आकाश से ड़रने के बाद
जब आदमी आदिम से अवतरित हो रहा होगा
तब कल्पना ने अपनी पैठ बनायी होगी
आकाश के पार
स्वर्ग और नर्क की रचना के बाद
वैतरणी अवतरित हुई होगी
गरूड़ पुराण के साथ


वैतरणी,
धरती पर जीवन के बाद की
सबसे बड़ी अवधारणा रही होगी
जिसे समझ के विकसित होने की प्रक्रिया में
और भी ज्यादा
भयावह बनाया होगा क्रमशः
कोई भी अनुसंधान लक्षित नही कर पाया
क्या वाकई वैतरणी जैसी कोई नदी भी है?
या हम यूँ ही ड़र रहे हैं?


जबसे,
बच्चे पैदा होने लगे हैं
चूजों की तरह प्रयोगशालाओं में अपने मनमाकिफ़ /
या कपास सीधे ही पहना जाने लगा है फ़ाहों की तरह /
या आदमी हो आया है चाँद पर
और समझने लगा है
हकीकत और कल्पना में भेद
कि स्वर्ग और नर्क जो भी यहीं हैं
पृथ्वी पर
तब से वैतरणी सिमट आयी है आकार में
ढ़ाई बाय पाँच या तीन बाय साढ़े पाँच के टेबल टॉप के बराबर
और आदमी जिन्दा ही
टेबल के इस पार से उस पार की यात्रा में
महसूस करता है
वैतरणी पार करने के सारे सुःख (दुःख मैं कहना नही चाहता)
अकेला ही /
किसी भी कीमत पर
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 20-अगस्त-2010 / समय : 05:30 सुबह / घर

कविता : रात नही होती तो

बुधवार, 18 अगस्त 2010

मुझे,

यह लगता है कि
रात नही होती तो
मैं,
दिन को खींचकर लम्बा कर लेता
शाम के मुहाने से
और खो जाता कहीं उस भीड़ में
जो, घर से निकलती तो है
और लौटने के पहले
बदल जाती है कहानियों में
घर के मुहाने पर

मुझे,

यह लगता है कि
रात नही होती तो
मैं,
कैद कर लेता सपनों को पलकों में
आँसुओं में बदलने से पहले
और ढ़ल जाता किसी गीत में
जिसे गुनगुनाया जा सकता है
मौन रहकर भी
और जिसकी अनुगूंज को किया जा सकता हो महसूस
दीवारों पर दरार बनाते हुये
जिनके पार दुनिया को देखा जा सकता है
बिना किसी चष्में के
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 17-अगस्त-2010 / समय : 10:17 साँय / ऑफिस

पतों के बीच लापता होते हुये

रविवार, 8 अगस्त 2010

दिन, जैसे आग में झुलस रहे हों
रातें,
पक रही हों अलाव की धीमी आँच पर
अब न भोर सुहाती है
न शाम सुहानी लगती है
सुकून,
जरूर किसी चिड़िया का नाम होगा
आजकल तो
शहर में इतनी भीड़ है कि
कभीकभी खुद परछांई को भी मुश्किल होता है
तलाश लेना ज़मीन अपने लिये
इंसानों से बचते हुये


दीवारों,
पर तनी हुई छत को
भले ही पहचाना लिया जाये
एक घर के नाम से
लेकिन वह छटपटाता रहता है
अपनी पहचान से
पूरी जिन्दगी एक पते से चिपके हुये
और
दीवारों के बाद
या तो जरूरतें बिखरी होती हैं
या रिश्ते तने हुये होते हैं
या आदमी गुम हुये होते हैं खुद की तलाश में
घर अब भी मौजूद होता है वहीं
पतों के बीच लापता होते हुये
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०८-अगस्त-२०१० / घर / समय : ०२:५३ दोपहर