जबसे,
परिवार छोटे और मॉड्यूलर हुये हैं
छाते भी सिमटने लगे हैं आकार में
छाता,
अब कम ही देखने में आता है
काला, सारस सा गर्दन मोड़े हुये
बड़ा इतना की घुटनों के नीचे तक कपड़े भीगने से बचें रहे
वैसे भी अब इतने बड़े कपड़े पहनता कौन है
यह छाते,
पुरखों से हस्तांरित होते हुये पीढियों में
जिन पर कहीं दादी ने तुरपई की हो सुराख पर
या दादा ने पहले सीखा हो लिखना
फिर धागों से गोठा हो अपना नाम
अब भी पाये जाते हैं
घरों में लटके हुये खूंटियों पे संस्कारों के साथ
या किसी कोने में कबाड़ के साथ
बाट जोहते हुये कि
किसी दिन बारिश होगी
और वो फिर निकाले जायेंगे
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : १२-जुलाई-२००९ / समय : ०३:४८ दोपहर / घर
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21 टिप्पणियाँ
आपकी रचनाएँ एक मीठी,भूली-भटकी यादों के गांव से घूमा लाती हैं,
25 जुलाई 2009 को 12:29 pm बजेबहुत अच्छा लगता है बीते लम्हों को देखना, उसे महसूस करना....
अब भी पाये जाते हैं
25 जुलाई 2009 को 1:20 pm बजेघरों में लटके हुये खूंटियों पे संस्कारों के साथ
या किसी कोने में कबाड़ के साथ
बाट जोहते हुये कि ..................
पुराने खूंटे से लटके रह जाते हैं यह अब भी पर बहुत सी यादे साथ समेटी होती हैं ..पुरानी यादो को यूँ याद करना भी सुखद सा एहसास है ...
yado ke pitare layi gaee yah rachana bahut hi sundar hai .........dil ke bahut hi karib lagi .........badhaaee
25 जुलाई 2009 को 2:15 pm बजेबहुत सुन्दर रचना है, मन को छू जाती है!
25 जुलाई 2009 को 2:22 pm बजे---
चाँद, बादल और शाम
pi cheeze bhi yaado ki tarah hoti hai......unhe dekh ke boht kuch yaad ata hai.....khoobsurat kavita...
25 जुलाई 2009 को 2:43 pm बजेअब भी पाये जाते हैं
25 जुलाई 2009 को 2:53 pm बजेघरों में लटके हुये खूंटियों पे संस्कारों के साथ
या किसी कोने में कबाड़ के साथ
बाट जोहते हुये
कुछ पुरानी यादें कही भी अटक जाती है और सिलसिला शुरू हो जाता है जो किसी न किसी नयी, सार्थक, और लाजवाब रचना को जनम देता है..........
मन को छूते शब्द, सुन्दर अभिव्यक्ति ।
25 जुलाई 2009 को 3:49 pm बजेजबसे,
25 जुलाई 2009 को 5:16 pm बजेपरिवार छोटे और मॉड्यूलर हुये हैं
छाते भी सिमटने लगे हैं आकार में
जी हा अब तो छाते पर्स मे समा जाते है.
बहुत सूक्ष्म निरीक्षण
सुन्दर रचना
वाह !!!! क्या बात कही आपने.......वर्तमान का यथार्थ यही है.....
25 जुलाई 2009 को 5:49 pm बजेबहुत ही सुन्दर इस रचना हेतु आभार स्वीकारें...
आपकी रचनायें जिंदगी से जुडी होती हैं ...बेहतरीन
25 जुलाई 2009 को 11:50 pm बजेमेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
सही बात है मुकेश जी भीगने लायक कपडे आज कल पहनता कौन है एक अच्छा व्यंग्य |एक फिल्म में प्रेम चौपडा बार बार यही कहते है .....नहाये क्या निचोड़े क्या
26 जुलाई 2009 को 10:58 am बजेतिवारी जी,
26 जुलाई 2009 को 3:53 pm बजेअतीत में झांकने को उकसाती हुई आपकी रचना सचमुच खो जाने को मजबूर करती है.सुन्दर भाव्
सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई!
इस बार तो न बारिश है न छाता निकला। न फोल्डिंग वाला, न पुरनका। :(
26 जुलाई 2009 को 7:45 pm बजे'बाट जोहते हुये कि
26 जुलाई 2009 को 8:28 pm बजेकिसी दिन बारिश होगी
और वो फिर निकाले जायेंगे'
- अद्भुत.साधुवाद.
घरों में लटके हुये खूंटियों पे संस्कारों के साथ
27 जुलाई 2009 को 11:06 am बजेया किसी कोने में कबाड़ के साथ
कितनी सहजता एवं सरलता से लिख दिया ...
अति सुन्दर रचना !!
भाई,
27 जुलाई 2009 को 4:45 pm बजेसंस्कारों के लेकर इतनी चिंता ना किया करो। अब तो कोई नाम भी नही लेता इनका।
वैसे, अच्छा लिखा है।
फिर मिलते हैं....
जीतेन्द्र चौहान
Pyari si kahavita. Modular parivar? Ya shayad ap nuclear kenha chaahte hain ..? I may be wrong.
27 जुलाई 2009 को 5:22 pm बजेGod bless
RC
wah, bahut khoob likha he aapane/
27 जुलाई 2009 को 6:37 pm बजेघरों में लटके हुये खूंटियों पे संस्कारों के साथ
mujhe ye line bahut achhi lagi/
aapki rishto me kareebi ki jo peni nazar he vo kaabile taarif he/ ye anubhav aour gambhirata se mahsoos karane par hi paripakvata prapt karti he/ bahut sundar tarike se vyakt ho rahi he aapki abhivyakti/
तिवारीजी,
28 जुलाई 2009 को 10:16 am बजेबहुत दुलारी-प्यारी-सी रचना--बहुत कुछ याद दिलाती हुई. आप बड़े सरल शब्दों में अपने भावों को कविता में पिरोते हैं, इतने एहतियात के साथ कि बात सीधे-सीधे पाठकों तक पहुँचती है ! भाव-संप्रेषण की इस अद्भुत प्रतिभा को मेरा सलाम पहुंचे. सप्रीत...
"बाट जोहते हुये कि
28 जुलाई 2009 को 8:09 pm बजेकिसी दिन बारिश होगी
और वो फिर निकाले जायेंगे"
अतीत के झोंको से झैँकती कविता पढ़कर
आनन्द आ गया।
बधाई।
/वैसे भी अब इतने बड़े कपड़े पहनता कौन है/
28 जुलाई 2009 को 10:35 pm बजेइस एक पंक्ति ने कविता को वक्त की बेहतरीन कविताओं की श्रेणी में ला खडा कर दिया ,बातों बातों में आधुनिकता के अन्धानुगमन के परिणामों को साफ़ तस्वीर की तरह पेश कर दिया इस पंक्ति ने ..बाकी कविता का मूल भाव तो वाकई जानदार है
अब भी पाये जाते हैं
घरों में लटके हुये खूंटियों पे संस्कारों के साथ
क्या खूब कहा गया है
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