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इन्सान के करीब से गुजरते हुये

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

साँप,

यदि अब भी साँप की तरह ही होते
तो अब तक उग आते पँख उनके
और दादी की किस्सों की तरह उड़ने लगते
आसमान में

जब से,
परियाँ आसमान से
नही उतरी ज़मीन पर
और मेरे पास वक्त नही बचा
न दादी के लिये और न अपने लिये
साँप,
पहनने लगे हैं इन्सानी चेहरा
और बस्तियों में रहने लगे हैं
बड़ा खौफ बना रहता है
किसी इन्सान के करीब से गुजरते हुये
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : १७-जुलाई-२०१० / समय : ०५:४५ सुबह / घर

नजदीकियों के चाक पर

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

तुम,
जब मेरे कंधे पर रखते हो
अपना हाथ
तो, मैं महसूस करता हूँ
कि कोई दबा देना चाहता है
मेरा हर वो हिस्सा
जो तलाश लेता है अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम
बिना झुके हुये
और दे देना चाहता है
अपनी पसंद का आकार मुझे
नजदीकियों के चाक पर

तुम,
जब मुस्कुराते हुये
पूछते हो मुझसे मेरा हाल
तो, मैं मह्सूस करता हूँ
तुम्हारी मुस्कुराहटों को दिल के पार गुजरते हुये
जैसे कोई बाँट देना चाहता है
मुझे दो हिस्सों में
एक वो जिसे मैं ढो रहा हूँ
और, एक वो जिसे तुम खरीदना चाहते हो
अपनी मुस्कुरहाटों के मोल पर

तुम,
जब मुझस बातें करते हों
मेरी आँखों में आँखें डालकर
तो, मैं महसूस करता हूँ
कि कोई मुझसे ही छीन रहा है
मेरी निजता
और थोप रहा है अपने शब्दों को मेरे जे़हन में
कि वह नाच सकें
तुम्हारे ईशारों पर किसी कठपुतली की तरह
अपनी पहचान खोते हुये
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०५-जुलाई-२०१० / समय : ०७:१० शाम / ऑफिस से लौटते

जंगली होता आदमी

सोमवार, 14 जून 2010

शायद,
अब बकरियाँ सीख लें
अपने दाँतों को पैना करना
और काट लें सड़कों पे भागते आदमी को


शायद,
अब मुर्गें भी सीख लें
अपने पंजों में जान डालना
और पकड़ बनाना मजबूत नाखूनों के सहारे
कुछ ऐसी की
नोंच सके आदमी का चेहरा


जंगल,
तो पहले भी महफूज नही था बिल्कुल
शायद इसिलिये ही
इन्होंने पसंद किया होगा
किसी खूंटे से बंधना /
तलाश लेना अपने लिये दड़बा कोई
लेकिन,
यह पालतू अब ड़रने लगे हैं
घरों में जंगली होते आदमी से
आखिर जान तो सभी को प्यारी होती है
फिर,
वो चाहे कोई चौपाया ले या दोपाया
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : १०-जून-२०१० / समय : ०३:०० दोपहर

पर्यावरण दिवस विशेष : पेड़ तब भी नही सुखाता

शुक्रवार, 4 जून 2010

कल ०५ जून विश्व पर्यावरण दिवस है, खूब शोर होगा, अपीले होंगी, पौधे रोपे जायेंगे, तस्वीरे खिंचेगी लोग जबरिया मुस्कुराते हुये न जाने क्या भाषण पेलेंगे और हो जायेगा इस बार भी पर्यावरण दिवस..........


चिडियों,
ने जब बदल लिया हो
अपना आशियाना /
छांव ने तलाश लिया हो
कोई और ठौर /
न किसी डाल पे
कोई झूलते याद करता हो किसी को /
न तले गुड़गुड़ाते हों हुक्का बूढ़े
सुबह से शाम तक
पेड़,
तब भी नही सुखाता


पेड़,
जब सूखता है तो,
केवल पत्ते नही झरते,
न ही दरारें झाँकने लगती है डालों से
या उसके तने को ठोंककर पूछा जा सकता हो हाल
जब,
जड़ों में सूखने लगती है
आशा की नमी
कि, किसी शाम
कोई गायेगा गीत जी भरके /
कोई रोयेगा बुक्का भरके /
कोई सुखायेगा पसीना
पेड़ सूख जाता है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : १६-अप्रैल-२०१० / समय : ०८:१० रात्रि / ऑफिस से लौटते

रात और मेरे बीच

रविवार, 9 मई 2010

रात,
से एक अजीब सा रिश्ता है मेरा
वह रखती है सहेजकर
गलियों में बिखरे शब्दों को मेरे लिये
जो लोग अपनी कहानी
पूरा करने के पहले छोड़ गये थे
और
उंड़ेल देती है मेरे सामने उस प्रहर
जब कोई नही होता हमारे बीच / साथ


मैं,
उन्ही शब्दों से लिखता हूँ
जब गीत कोई
तो महसूस करता हूँ
उन शब्दों को गंधाते
उसी बू से जो आती है जांघों के आस-पास
अंतर्वस्त्रों से लिपटी हुई


मैं,
उन्ही शब्दों से लिखता हूँ
जब कविता कोई
तो महसूस करता हूँ
उन शब्दों में खारापन
वही खारापन जो हम गालों पर महसूस करते हैं
आँसुओं के सूख जाने के बाद


उन्हीं,
शब्दों के ढेर में होते हैं
कई विषय मेरे लिये
जिनसे लिखी जा सकती हैं
हजारों लघुकथायें या कई बड़ी कहानियाँ
यह तीखे से शब्द
महकते हैं सस्ते परफ़्यूम की तरह
जो बाजार में औरतें लगाती हैं


कोई,
उपन्यास या खण्डकाव्य लिखना
तो मेरे धैर्य की सीमा से बाहर है
हाँ, यदि आप चाहें तो
मैनें बचाकर रक्खें है
ना जाने ऐसे कितने विषय
किसी रूमाल की तरह अपने पास
जो कॉलगर्ल्स अक्सर छोड़ जाती हैं हड़बड़ी में
या लिपस्टिक के उन निशानों की तरह
जो तकिये पर से
हमारा मुँह बा रहे होते हैं
पसीने से तर-ब-तर
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०७-मार्च-२०१० / समय : ०३:२५ दोपहर / ऑफिस

फिर भी ड़र तो लगता ही है न ?

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

मैंने,
सीखा वक्त के साथ
दीवार के पार देखना/
देख लेना चेहरे के पीछे चेहरा
सूरज, जहाँ डूबता प्रतीत होता है
वहाँ की गहराई नाप लेना


मैंने,
यह भी सीखा कि
जिंदा रहने के लिये
जो जरूरी है
कैसे किया जाये?
जिन्दा बने रहने के लिये
जो भी जरूरी हो


सीखा,
तो यह भी था कि
जब जिन्दा रहना ही एक सवाल हो
तो कैसे बचाये रखना है
अपनेआप को
लेकिन
फिर भी ड़र तो लगता ही है न ?
आखिरकार,
जिन्दा बचे रहना
केवल अपने हाथ में ही तो नही होता
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : २६-मार्च-२०१० / समय : १०:५६ रात्रि / घर

नींद को थपकियाँ देते हुये

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

मुझे,
यह भ्रम अक्सर होता है कि
कोई मेरे दरवाजे पर
दे रहा है दस्तक
या कभी रात यह भी महसूस होता है कि
पुकारा है किसी ने मेरा नाम लेकर
या
कोई मेरा पीछा कर रहा है
बड़ी देर से
मुझे सुनायी देती हैं
अन्जानी आहटें रह रहकर
या
किसी मोड़ पर
ठिठक जाते हैं कदम मुड़ने से पहले
लगता है कोई मेरी ताक में बैठा है छिपकर

मुझपे,
सवार हो यह भ्रम
उतर आता है मेरे बेड़रूम में
मैं महसूस करता हूँ
किसी साये की गर्मी को
बड़ी देर से यूँ ही बिछी हुई चादर पर
फिर,
वही भ्रम दौड़ने लगता है
मेरी रगों में
और
चुहचुहाने लगता है पेशानी पर
लगता है
आज फिर जागना पड़ेगा सारी रात
नींद को थपकियाँ देते हुये
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०६-अप्रैल-२०१० / समय : ०७:४५ सायं / ऑफिस से लौटते