हम,
जितना बचाना चाहते हैं
उतनी ही तेजी से बदल रहीं हैं
हमारी परंपरा
प्रेम,
अब भूलने लगा है
बसंती फूलों की भाषा
रट रहा है
लाल गुलाबों का ककहरा
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : १४-फरवरी-२००९
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