मेरे लिए
फिर नही लौटा
बयारो वाला मौसम
लाख चाहने पर भी
मिट्टी से नही उठी
सौंधी गमक
न ही इन्द्रधनुष खिंचा
वितान पर
नही आई ठिठुरन अबके
मेरी दालान में
धूप कन्नी काटती रही
आँगन से
किस अजीब से
मौसम को जी रहे हैं हम
सन्दर्भ सभी
बेमानी से हो आए हैं
अब आदमी की बात करो तो
जी धक्क सा करता है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : 25-नवम्बर-2018/समय : 18:55/इन्दौर-गुना यात्रा में
कविता : बेमानी सन्दर्भ
रविवार, 25 नवंबर 2018
कविता : पड़ाव
शनिवार, 1 जुलाई 2017
करीब साढे नौ सालों के बाद अचानक फ़िर अपने ब्लॉग कि याद आई है.....
उम्र ने बढते हुये
द्दर्ज कर दी थी पेशानियों पे
अपनी मौजुदगी
और सफ़ेदी बढते हुये
कह ही दिया था
कि बहुत हो चुका सब
मन था कि
मानता ही नही
कभी यहाँ कभी वहाँ
अखबारों से शुरु हुआ सिलसिला
थमा तो व्हात्सएप पर
इस बीच पत्रिकायें थै तो
कभी फ़ेसबुक
लेकिन
छाँवभरी गोद लेकर
आज फ़िर याद आया है
ब्लॉग
किसी पड़ाव की तरह
एक थका देने वाली
जीवनयात्रा में
एक सुकून भरा ठहराव लिये....
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : 01-जुलाइ-2017 / समय : 04:40 दोपहर / घर
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
लेबल:
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
उम्मीदों की सलीब
रविवार, 28 अगस्त 2016
एक बोझिल सुबह
जिसमें समेटना है दिन का विस्तार
इसके पहले कि मायूसियाँ
शाम के साथ
लिपटने लगे पहलु के साथ
दौड़ना है दिनभर
काँधे पर टाँगें
उम्मीदों की सलीब ...
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक 28-अगस्त-2016/सुबह : 09:15/घर
कविता : पंख
मंगलवार, 3 सितंबर 2013
मैं
जब तक नही जानता था अपने पंखों को
अन्जान था
आकाश की गहराइयों से
बस
धरती के छोर पर ही
खत्म हो जाती थी
दुनिया मेरी
एक सुबह
आकाश ने रचे
मेरे लिए
तब कहीं जाके
मेरे पंखों ने लांघी
क्षमता की दहलीज
और समूचा
आकाश सिमट आया
मेरी उड़ान में
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०३-सितम्बर-२०१३ / १०:४० रात्रि / घर
कविता : उम्र के दोराह पर......
रविवार, 7 अप्रैल 2013
मेरे एक करीबी मित्र हैं वली खान और उनके साहबजादे अमन खान, बस एक दिन यूँ ही कह बैठे कि अंकल एक ऐसी कविता सुनाओ जिसमें मैं हूँ, बच्चे की अचानक की गई इस माँग से मैं पहले तो हतप्रभ था लेकिन फिर एक प्रयास से उनके ड़ाईंग रूम में ही तकरीबन आशु कविता सी जो उस बच्चे ने बहुत पसंद की और मुझे कहीं ऐसा लगा जैसे शायद मैं उसकी भावनाओं को समझ पाया, अपने प्रयास में :-
मैं
चाहता हूँ
फिर से खेलना
मिट्टी से बनाना घर
अपने सपनों का
और
रचना एक छोटी सी दुनिया......शांत
यहाँ
बहुत शोर है
और मोटी मोटी किताबें
होमवर्क / एक्जाम्स में फेल होने का खौफ़
बागीचे में
तितलियों के पीछे
या जमा करते हुए चिडियों के पंख
या बहुत दूर तक भागते हुए
किसी पतंग का पीछे करते
तो मेरा बचपन गुम हो रहा है
और बड़ा होकर क्या करना है
सामने खड़ा है
किसी यक्ष प्रश्न सा
इतना भ्रमित होता हूँ
इस दोराहे पर
अपने बचपन में
उन्हीं सुहाने दिनों में
अपनी कॉमिक्स की दुनिया में
दादा की उंगली पकड़
फिर से घूमता रहूँ
अपनी लॉन में और सीखता रहूँ चलना
अपने कदमों पर
------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 17-नवम्बर-2012 / समय : 01:00 दोपहर / अमन खान के लिए
मैं
चाहता हूँ
फिर से खेलना
मिट्टी से बनाना घर
अपने सपनों का
और
रचना एक छोटी सी दुनिया......शांत
यहाँ
बहुत शोर है
और मोटी मोटी किताबें
होमवर्क / एक्जाम्स में फेल होने का खौफ़
फिर से
खो जाना चाहता हूँ बागीचे में
तितलियों के पीछे
या जमा करते हुए चिडियों के पंख
या बहुत दूर तक भागते हुए
किसी पतंग का पीछे करते
यहाँ से
जो मैं देख रहा हूँ तो मेरा बचपन गुम हो रहा है
और बड़ा होकर क्या करना है
सामने खड़ा है
किसी यक्ष प्रश्न सा
इतना भ्रमित होता हूँ
इस दोराहे पर
फिर से
लौट जाना चाहता हूँ अपने बचपन में
उन्हीं सुहाने दिनों में
अपनी कॉमिक्स की दुनिया में
दादा की उंगली पकड़
फिर से घूमता रहूँ
अपनी लॉन में और सीखता रहूँ चलना
अपने कदमों पर
------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 17-नवम्बर-2012 / समय : 01:00 दोपहर / अमन खान के लिए
कविता : कल्पवृक्ष
शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013
एक लम्बे अंतराल के बाद कोई पोस्ट कर पा रहा हूँ, इसबीच अपनी नौकरी की व्यस्तताएँ, कमिटमेंट्स फिर बेटे का बीमार हो जाना और फिर एम.ई.(प्रोडक्शन इंजि एवं डिजाइन) कि परिक्षाएँ न जाने उलझने हैं कि खत्म ही नही होती। अब बाहा-२०१३ (www.bajasaeindia.org) की तैयारियों में उलझा हुआ हूँ, बहरहाल हाल में लिखा हुआ आप सबसे बाँट लेना चाहता हूँ :-
नानी की कहानियों में
अक्सर सुना था
कल्पवृक्ष
और वो
मेरे
सपनों में सवार था तभी से
किसी दिन
मैं पा जाऊंगा उसे
अपनी सारी इच्छाएँ
पूरी कर लूंगा
ऐसे न जाने कितने सपने पाले
बड़ा हो गया
एक दिन
अब न तो कल्पवृक्ष है
न नानी
लेकिन अब भी
सपने हैं
इच्छाएँ हैं
और
विकल्प
की तलाश मौजूद है
शायद इनमें ही कहीं होगा
मेरा कल्पवृक्ष
----------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 22-जनवरी-2013 / समय : रात्रि 8:00 / राजश्री हास्पिटल
नानी की कहानियों में
अक्सर सुना था
कल्पवृक्ष
और वो
मेरे
सपनों में सवार था तभी से
किसी दिन
मैं पा जाऊंगा उसे
अपनी सारी इच्छाएँ
पूरी कर लूंगा
ऐसे न जाने कितने सपने पाले
बड़ा हो गया
एक दिन
अब न तो कल्पवृक्ष है
न नानी
लेकिन अब भी
सपने हैं
इच्छाएँ हैं
और
विकल्प
की तलाश मौजूद है
शायद इनमें ही कहीं होगा
मेरा कल्पवृक्ष
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 22-जनवरी-2013 / समय : रात्रि 8:00 / राजश्री हास्पिटल
कविता : तुम्हारे हिस्से का वक्त
शनिवार, 20 अक्टूबर 2012
हम
दोनों के बीच पूरे चैबीस घंटे थे
यदि मेरे बस में होता तो लिख देता
अपने हिस्से को भी
तुम्हारे नाम
और यह जद्दोजेहद
यहीं खत्म हो जाती
हमेशा के लिए कि
मेरे पास तुम्हारे लिए वक्त नही है
मेरे
अपने पास तो अपनी वज़हों के लिए
खामोशियाँ ही बचती है
जिन्हें तुम अक्सर
मेरी लाचारियों का नाम दे देती हो
और यही समझती हो
ऑफिस में
और कुछ नही होता
सिवाय लकीरों के पीटने के
यह वक्त का साँप
न जाने कब सरक आया है
तुम्हारे पास
और मैं लौटा हूँ
तुम्हारे हिस्से का वक्त
जाया करके
-------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 30-जुलाई-2012 / समय : 06:10 सुबह / घर
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