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कविता : फोड़ लो आँखें अपनी

शनिवार, 13 अगस्त 2011

जो,
आवाजें
तुम्हें सुनाय़ी दे रही
उन्हें सुनते रहना या
बर्दाश्त कर पाना
तुम्हारे बस में नही है

तुम,
बहुतकुछ
न चाह के भी देख रहे हो
बरबस
जैसे इन्द्रियों ने
खुद हथिया लिये हो
सारे नियंत्रण

अपने
कानों को
हाथ से ढांप लेने /
उंगलियाँ डाल लेने से
कुछ नही होगा
यह आवाजें तब भी आयेंगी
तुम
अपने कानों में
भर लो पिघला सीसा
(यह मुफ्त मिल रहा है आजकल)
तब न आवाजें आयेंगी
न ही हाथ उलझे रहेंगे
आवाजों से लड़ते

आँखें,
कुछ देर तो बंद
रखी जा सकती हैं
लेकिन ता-उम्र नही
गांधारी प्रतिज्ञ होने के बावजूद भी
नही छोड़ पायी थी लोभ
एक दृष्टी देखने का
इसलिए
यदि बचना चाहते हो
आँख-मिचौनी से तो
फोड़ लो आँखें अपनी
(कई मॉल्स में कान के साथ आँखों का पॅकेज मुफ्त मिल रहा है)
 
इसके,
बाद तुम किसी भी दिशा में जाओ
तुम महसूस करोगे
लोगों से टकराते /
या उनकी साँसों के स्पर्श को
लेकिन,
कोई बैचेनी
न तुम्हारे अंतर होगी
ना आँखों में
और न ही कान में
और,
यह जो भी है.......हुजूम
तुम्हारे साथ ही बना रहेगा
कयामत तक

जिनके,
दादाओं ने कभी फूंका था
बिगुल तुम्हारे कानों में
या जिनके बाप ने
तुम्हें दिखाये थे रंगीन सपने 
कान और आँखें
अब केवल
उनके वंशजों के पास ही होंगे
और वो ही तुम्हें हाँकेगें
कभी जयकारों के लिए
तो कभी वोटों के लिए
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 25-जुलाई-2011 / समय : 11:40 रात्रि / घर (वायरल फीवर की चपेट में बिस्तर पर) 

कविता : अंगूठे का सहारा

शनिवार, 16 जुलाई 2011

गुरू पूर्णिमा के अवसर गुरू और गुरू दक्षिणा दोनों की ही याद आ जाती है.... गुरू द्रोणाचार्य सा और शिष्य एकलव्य जैसा। इसी परंपरा का निर्वाह आज के संदर्भ में किस प्रकार से हुआ है / किया जा रहा है, अंगूठे की उसी महत्ता को प्रस्तुत कविता में एक नई दृष्टी से देखने का प्रयास किया है :-

अंगूठे,
को लेकर
मेरा कौतुहल
आज भी विद्यमान है
महाभारत काल से लगाकर आजतक
जब आदमी रख चुका है
अपने कदम अंतरिक्ष के सीने पर
अंगूठे के अस्तित्व को नही नकार पाया है
फिर, वो चाहे
एकलव्य का रहा हो
आम आदमी का
किसी


आज भी
जब विज्ञान नही समझ पाता है
किसी बात को
रुक जाता है
किसी रूल ऑफ थम्ब पर
लेते हुए सहारा अंगूठे का
तर्कों को ठेंगा दिखाते हुए
------------
मुकेश कुमार तिवारी
गुरू पूर्णिमा के अवसर पर / दिनाँक : १५-जुलाई-२०११

कविता : मशरूम में सिमटा हुआ आदमी

मंगलवार, 21 जून 2011

मशरूहफियाँ,
आदमी को सिखाती हैं
खुद में ही सिमटे रहने
और सिमटते रहना
किसी ऊन के गट्टे की तरह
और गढ़ना दुनिया अपने इर्द-गिर्द
जो भी आस-पास है
उसे समेटे रहना
सिर्फ अपने लिये

किसी दिन,
यह मशरूहफियाँ
बदल के रख देती हैं
इस सिमटे हुए आदमी को
किसी मशरुम में
और वो कटने लगता है इन्सानों से
पाया जाने लगता है किसी कोने में
कुकरमुत्ते की तरह
एकाकी
तकरीबन शेष दुनिया से अलग-थलग
या अपनी ही प्रजाति में
बेतरतीब उगी हुई कॉलोनी सा
लगभग बेमतलब......
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 28-05-2011 /समय : 01:45 दोपहर / लंच ब्रेक

नज़्म : सूरज संग तकादा आया

बुधवार, 8 जून 2011

जब भी दर्द बटाँ दुनिया में
मेरे हिस्से ज्यादा आया

सबने सबकी सुध ले ली
अपने काम इरादा आया

सबको मिला वही जो चाहा
मेरे हक़ में वादा आया

कर्ज रात का आँखों में ले
सूरज संग तकादा आया

दुनियादारी लगी तमाशा
तब जाना क्यूं नादाँ आया

चेहरे पुते बहुत थे लेकिन
काम यही इक सादा आया

शाह वज़ीर मस्ती में डूबे
अपनी बारी प्यादा आया
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 01-जून-2011 / समय : 11:40 रात्रि / घर

कविता : घमौरियाँ पालते हुए

सोमवार, 23 मई 2011

गर्मियों के आते ही कोयल का कूकना, आम की डालियों का फलों से लद जाना, प्यास बुझाते लाल तरबूज और न जाने क्या-क्या। लेकिन घमौरियों का गर्मी में उभर आना जैसे किसी बिन बुलाये मेहमान की तरह आ जाना गर्मियों के दिनों को रह-रहकर याद दिलाता है। मुझे ऐसा लगता है केवल घमौरियाँ ही मौसम की वज़ह से नही आती कोई और भी इस साजिश में शामिल है.......

विचारों से,
जैसे भागना मुश्किल था
पूरे दिमाग में महसूस कर रहा था
बादलों की तरह घुमड़ते
या अलाव पर फुदकते हुए पॉपकार्न सा
और
अपनी प्रोफ़ेशनल मज़बूरियों के चलते
न भीग पा रहा था
न कसमसा पा रहा था

वो,
सुबह जिसके सपने
देखे थे सारी रात
और आँखों में ही गुजार दिया था
वो सारा वक्त
जब दुनिया या तो
बढ़ने की कवायद में जुटी होती है
या व्यापार कर रही होती है
घोडों का
तब मैं बुन रहा था
एक निराली सुबह अपने लिये

उस,
सुबह का इंतजार
मुझे हर रात के बाद होता है
लेकिन,
सूरज मेरे लिये उगता ही है
बोझिल / थका-माँदा
जैसे रात ने
उसे उछालकर फेंक दिया हो
क्षितिज से आसमान की ऊँचाईयों पर
और वो मेरे कंधों पे
अपना सिर रखकर सो जाता है
मैं अपनी पीठ पर
पालने लगता हुँ घमौरियाँ
अपनी सुबह का इंतजार करते
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 07-मई-2011 / समय : 12:27 रात्रि / घर

कविता : मेरा - तुम्हारा सच!

मंगलवार, 17 मई 2011

सच!,
क्या उतना ही था?
जितना कि हम जानते थे
उसे सच होने के लिये
या कुछ और भी था
जुदा उसके सच होने से?

सच!,
जब मैनें पूछा किताबों से तो
गुम हो गया कहीं
अलबत्ता झूठ के पुलिंदों में मौजूद
हर काले अक्षर ने
अपने को सच साबित करने का
हरसंभव प्रयास किया

सच!
जब मैंने खोजा अपने आस-पास तो
हर बार यूँ लगा कि
जैसे जिन्दगी ने छला हो
साँसों के मोल पर
और झूठ को ही बाँधा हो अपनी गाँठ में
सच के नाम पर

सच!
जब दिल की गहराईयों में
तलाशा
तब कानों में झूठ की शहनाईयों ने
चीखकर कहा कि
जो सुनाई दे रहा है
वही सच है

तब से,
आज तक मैं जो
देखता हूँ / महसूस करता हूँ / सुनता हूँ
सच मान लेता हूँ
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 11-अप्रैल-2011 / समय : 11:09 रात्रि / घर

कविता : देह होने का भ्रम

बुधवार, 4 मई 2011

तुमने,
मेरे लाख मना करने के
बावजूद
यह मान लिया है
कि तुम अपनी शुरूआत
किसी पूर्णविराम के बाद ही करोगी
और उपसंहार को लिखोगी
अपनी जुबान में
या जब यह धरती सिमट आयेगी
और महाप्लावन के बाद
प्रथम अंकुरण होगा
तब तुम फूट पड़ोगी
जीवन के प्रथम चरण का स्वागत करते
या हथेलियों में मौजूद
सभी रेखायें
अपना लिखा पूरा कर चुकी होंगी
तब तुम किसी पड़ी हुई दरार को
बदल दोगी भाग्यरेखा में
और विधि के
मुकाबिल खड़ी हो जाओगी
सदेह

तुम,
अपनेआप को
एक देह होने के भ्रम से
मुक्त कर लो
और बदल जाओ उम्मीद में किसी दिन
और फिर शेष जिन्दगी
यूँ ही गुजार दो
किसी के चेहरे पर सजे हुए
या आँखों में

तुम,
अपनी सिसकियों के
बीच का अंतराल सौंप दो मुझे
मैं,
वहाँ भरना चाहता हूँ
संगीत !
और गुनगुनाना चाहता हूँ
गीत,
जो तुम्हें पसंद हो
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 28-अप्रैल-2011 / समय : 11:35 रात्रि / घर