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कविता : खिड़कियों की दुनिया से........

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

खिड़कियों से, बाहर झाँकते हुए
तुम कभी भी नही देख पाओगे
दुनिया कैसी है
तुम्हारी किताबों से कितनी अलग
जिस जमीन पर वह घर है
खिड़कियों वाला
वो भी उसी दुनियाँ में हैं
जिसे तुम अपने ड्राईंगरूम में
कार्नर टॅबल पर पाते हो 

खिड़कियाँ,
यदि न बनाई गई होती
तो तुम शायद
नही पहचान पाते हवा को भी
तलाशते किसी आकार में उसे
फिर सहम के बैठ जाते कि
कैसे ले पाओगे साँस
हवा होती ही नही है
किताबें इतना सिखा देती हैं जरूर

ढाई बाय चार फिट के बाद
जहाँ खिड़कियाँ
विलीन होने लगती हैं दीवारों में
उसके बाद ही
तमाम दुनियाँ पसरी होती है इर्द-गिर्द
लेकिन तुम्हारी किताबों 
सिखाती हैं तुम्हें क्षितिज का होना
तुम्हारे और आसमान के छोर पर
तुम ने नही देखा है
खुला आसमान कभी
और नही देखा है
आदमी की आशाओं को उड़ते पतंग की तरह
खिड़कियाँ तो बस
तुम्हें सिखा देती हैं जड़ रहना
और खुद को समेटे रहना चहर दीवारी में

रात,
उतनी अंधेरी नही है
जितनी लगती है
खिड़की से बाहर
आँखों का अपना विज्ञान है
और वो देख ही लेती हैं
किसी भी अंधेरे में
जितना देखना चाहती हैं
लेकिन खिड़कियाँ तय करती हैं कि
आँखों को कितना देखना है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०१-अगस्त-२०११ / समय : १२:०० रात्रि / घर

कविता : कुछ मोहब्बत भरी बातें

सोमवार, 26 सितंबर 2011

आज चार दिन के प्रवास पर निकला हूँ और यह पहला ही दिन है और वो भी अभी पूरा नही हुआ है, कल सुबह से ही ट्रेनिंग क्लास और फिर न जाने क्या-क्या। लेकिन एक बात तो है, मैं तुम्हें मिस कर रहा हूँ...........इस वक्त भी


तुम्हें,
बड़ा अजीब सा लगता है
घर में यूँ ही सिमटे रहना
या समय काटने को
लेकर बैठ जाना
सिलाई / कढाई / चुनाई या बुनाई
अचार के लिये कैरियाँ काटते
या पापड़ के लिये आलू का मांड़ पकाते
तुम्हें लगता है
कोई रच रहा है साजिश
औरतों के खिलाफ

मैं,
नही चाहता कि
तुम किसी दिन भूल जाओ
अपना नाम भी
और गुमसुम बैठी रहो
ताकते शून्य में
भावशून्य चेहरे पर उभर आयें
आंसुओं की लकीरें

किसी,
प्रश्‍न के जवाब में
तुम्हें तलाशने हो शब्द
फिर थक-हार चुप बैठ जाना हो
या बड़ी देर बाद कुछ कहना हो धीमे से
और,
किसी प्रतिप्रश्‍न के जवाब में
सुबकते हुये थमी नज़रों से देखना हो

इसलिये,
सिर को झटककर
एक बार देखो मेरी ओर  
मुस्कुराओ
और झाडू उठाकर बुहारो
मेरा कमरा
फिर कमर में खोंसकर साड़ी
और चौखट से टिके हुये
कुछ बातें करों मुहब्बत भरी
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : १७-मई-२००९ / समय : ११:२० रात्रि / घर

कविता : अण्णा, यह ठीक नही किया तुमने

शनिवार, 27 अगस्त 2011

शायद, तुम नही जगाते तो
हम जागते ही नही
नींद का खुमार अब भी बाकी है
हम जैसे स्वपन में जीने के आदी हो गये हैं
और हमारी दुनिया
जिसमें वो भी हैं
जो देते हैं नशा हमें ग़ाफिल करने के लिए

तुम नही बताते कि
जब आसमान में तारे नही होते तो
उसे दिन कहते हैं
शायद हम जान ही नही पाते कि
दिन होने का मतलब क्या है
बस रात में ही डूबे रहते
वादों का सुरमा लगाये अपनी आँखों में

तुम,
यदि नही बतलाते कि
ये टोपियाँ कितनी उजली हैं तो
शायद हम जिन्दगी यूँ ही गुजार देते
कभी टोपियाँ खरीदते ही नही
बस पहनते जाते
उन्हें देखते हुए

अण्णा,
यह ठीक नही किया तुमने
जगाके रख दिया
इस सोते देश को
कम-अज-कम सपने तो देख ही रह था
खुशहाली के
अब रोयगा कि पहले क्यों नही जागा
लेकिन,
तुम्हें इससे मिलेगा क्या?
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 22-अगस्त-2011 / समय : 11:56 रात्रि / घर

कविता : फोड़ लो आँखें अपनी

शनिवार, 13 अगस्त 2011

जो,
आवाजें
तुम्हें सुनाय़ी दे रही
उन्हें सुनते रहना या
बर्दाश्त कर पाना
तुम्हारे बस में नही है

तुम,
बहुतकुछ
न चाह के भी देख रहे हो
बरबस
जैसे इन्द्रियों ने
खुद हथिया लिये हो
सारे नियंत्रण

अपने
कानों को
हाथ से ढांप लेने /
उंगलियाँ डाल लेने से
कुछ नही होगा
यह आवाजें तब भी आयेंगी
तुम
अपने कानों में
भर लो पिघला सीसा
(यह मुफ्त मिल रहा है आजकल)
तब न आवाजें आयेंगी
न ही हाथ उलझे रहेंगे
आवाजों से लड़ते

आँखें,
कुछ देर तो बंद
रखी जा सकती हैं
लेकिन ता-उम्र नही
गांधारी प्रतिज्ञ होने के बावजूद भी
नही छोड़ पायी थी लोभ
एक दृष्टी देखने का
इसलिए
यदि बचना चाहते हो
आँख-मिचौनी से तो
फोड़ लो आँखें अपनी
(कई मॉल्स में कान के साथ आँखों का पॅकेज मुफ्त मिल रहा है)
 
इसके,
बाद तुम किसी भी दिशा में जाओ
तुम महसूस करोगे
लोगों से टकराते /
या उनकी साँसों के स्पर्श को
लेकिन,
कोई बैचेनी
न तुम्हारे अंतर होगी
ना आँखों में
और न ही कान में
और,
यह जो भी है.......हुजूम
तुम्हारे साथ ही बना रहेगा
कयामत तक

जिनके,
दादाओं ने कभी फूंका था
बिगुल तुम्हारे कानों में
या जिनके बाप ने
तुम्हें दिखाये थे रंगीन सपने 
कान और आँखें
अब केवल
उनके वंशजों के पास ही होंगे
और वो ही तुम्हें हाँकेगें
कभी जयकारों के लिए
तो कभी वोटों के लिए
-----------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 25-जुलाई-2011 / समय : 11:40 रात्रि / घर (वायरल फीवर की चपेट में बिस्तर पर) 

कविता : अंगूठे का सहारा

शनिवार, 16 जुलाई 2011

गुरू पूर्णिमा के अवसर गुरू और गुरू दक्षिणा दोनों की ही याद आ जाती है.... गुरू द्रोणाचार्य सा और शिष्य एकलव्य जैसा। इसी परंपरा का निर्वाह आज के संदर्भ में किस प्रकार से हुआ है / किया जा रहा है, अंगूठे की उसी महत्ता को प्रस्तुत कविता में एक नई दृष्टी से देखने का प्रयास किया है :-

अंगूठे,
को लेकर
मेरा कौतुहल
आज भी विद्यमान है
महाभारत काल से लगाकर आजतक
जब आदमी रख चुका है
अपने कदम अंतरिक्ष के सीने पर
अंगूठे के अस्तित्व को नही नकार पाया है
फिर, वो चाहे
एकलव्य का रहा हो
आम आदमी का
किसी


आज भी
जब विज्ञान नही समझ पाता है
किसी बात को
रुक जाता है
किसी रूल ऑफ थम्ब पर
लेते हुए सहारा अंगूठे का
तर्कों को ठेंगा दिखाते हुए
------------
मुकेश कुमार तिवारी
गुरू पूर्णिमा के अवसर पर / दिनाँक : १५-जुलाई-२०११

कविता : मशरूम में सिमटा हुआ आदमी

मंगलवार, 21 जून 2011

मशरूहफियाँ,
आदमी को सिखाती हैं
खुद में ही सिमटे रहने
और सिमटते रहना
किसी ऊन के गट्टे की तरह
और गढ़ना दुनिया अपने इर्द-गिर्द
जो भी आस-पास है
उसे समेटे रहना
सिर्फ अपने लिये

किसी दिन,
यह मशरूहफियाँ
बदल के रख देती हैं
इस सिमटे हुए आदमी को
किसी मशरुम में
और वो कटने लगता है इन्सानों से
पाया जाने लगता है किसी कोने में
कुकरमुत्ते की तरह
एकाकी
तकरीबन शेष दुनिया से अलग-थलग
या अपनी ही प्रजाति में
बेतरतीब उगी हुई कॉलोनी सा
लगभग बेमतलब......
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 28-05-2011 /समय : 01:45 दोपहर / लंच ब्रेक