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नज़्म : सूरज संग तकादा आया

बुधवार, 8 जून 2011

जब भी दर्द बटाँ दुनिया में
मेरे हिस्से ज्यादा आया

सबने सबकी सुध ले ली
अपने काम इरादा आया

सबको मिला वही जो चाहा
मेरे हक़ में वादा आया

कर्ज रात का आँखों में ले
सूरज संग तकादा आया

दुनियादारी लगी तमाशा
तब जाना क्यूं नादाँ आया

चेहरे पुते बहुत थे लेकिन
काम यही इक सादा आया

शाह वज़ीर मस्ती में डूबे
अपनी बारी प्यादा आया
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 01-जून-2011 / समय : 11:40 रात्रि / घर

कविता : घमौरियाँ पालते हुए

सोमवार, 23 मई 2011

गर्मियों के आते ही कोयल का कूकना, आम की डालियों का फलों से लद जाना, प्यास बुझाते लाल तरबूज और न जाने क्या-क्या। लेकिन घमौरियों का गर्मी में उभर आना जैसे किसी बिन बुलाये मेहमान की तरह आ जाना गर्मियों के दिनों को रह-रहकर याद दिलाता है। मुझे ऐसा लगता है केवल घमौरियाँ ही मौसम की वज़ह से नही आती कोई और भी इस साजिश में शामिल है.......

विचारों से,
जैसे भागना मुश्किल था
पूरे दिमाग में महसूस कर रहा था
बादलों की तरह घुमड़ते
या अलाव पर फुदकते हुए पॉपकार्न सा
और
अपनी प्रोफ़ेशनल मज़बूरियों के चलते
न भीग पा रहा था
न कसमसा पा रहा था

वो,
सुबह जिसके सपने
देखे थे सारी रात
और आँखों में ही गुजार दिया था
वो सारा वक्त
जब दुनिया या तो
बढ़ने की कवायद में जुटी होती है
या व्यापार कर रही होती है
घोडों का
तब मैं बुन रहा था
एक निराली सुबह अपने लिये

उस,
सुबह का इंतजार
मुझे हर रात के बाद होता है
लेकिन,
सूरज मेरे लिये उगता ही है
बोझिल / थका-माँदा
जैसे रात ने
उसे उछालकर फेंक दिया हो
क्षितिज से आसमान की ऊँचाईयों पर
और वो मेरे कंधों पे
अपना सिर रखकर सो जाता है
मैं अपनी पीठ पर
पालने लगता हुँ घमौरियाँ
अपनी सुबह का इंतजार करते
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 07-मई-2011 / समय : 12:27 रात्रि / घर

कविता : मेरा - तुम्हारा सच!

मंगलवार, 17 मई 2011

सच!,
क्या उतना ही था?
जितना कि हम जानते थे
उसे सच होने के लिये
या कुछ और भी था
जुदा उसके सच होने से?

सच!,
जब मैनें पूछा किताबों से तो
गुम हो गया कहीं
अलबत्ता झूठ के पुलिंदों में मौजूद
हर काले अक्षर ने
अपने को सच साबित करने का
हरसंभव प्रयास किया

सच!
जब मैंने खोजा अपने आस-पास तो
हर बार यूँ लगा कि
जैसे जिन्दगी ने छला हो
साँसों के मोल पर
और झूठ को ही बाँधा हो अपनी गाँठ में
सच के नाम पर

सच!
जब दिल की गहराईयों में
तलाशा
तब कानों में झूठ की शहनाईयों ने
चीखकर कहा कि
जो सुनाई दे रहा है
वही सच है

तब से,
आज तक मैं जो
देखता हूँ / महसूस करता हूँ / सुनता हूँ
सच मान लेता हूँ
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 11-अप्रैल-2011 / समय : 11:09 रात्रि / घर

कविता : देह होने का भ्रम

बुधवार, 4 मई 2011

तुमने,
मेरे लाख मना करने के
बावजूद
यह मान लिया है
कि तुम अपनी शुरूआत
किसी पूर्णविराम के बाद ही करोगी
और उपसंहार को लिखोगी
अपनी जुबान में
या जब यह धरती सिमट आयेगी
और महाप्लावन के बाद
प्रथम अंकुरण होगा
तब तुम फूट पड़ोगी
जीवन के प्रथम चरण का स्वागत करते
या हथेलियों में मौजूद
सभी रेखायें
अपना लिखा पूरा कर चुकी होंगी
तब तुम किसी पड़ी हुई दरार को
बदल दोगी भाग्यरेखा में
और विधि के
मुकाबिल खड़ी हो जाओगी
सदेह

तुम,
अपनेआप को
एक देह होने के भ्रम से
मुक्त कर लो
और बदल जाओ उम्मीद में किसी दिन
और फिर शेष जिन्दगी
यूँ ही गुजार दो
किसी के चेहरे पर सजे हुए
या आँखों में

तुम,
अपनी सिसकियों के
बीच का अंतराल सौंप दो मुझे
मैं,
वहाँ भरना चाहता हूँ
संगीत !
और गुनगुनाना चाहता हूँ
गीत,
जो तुम्हें पसंद हो
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 28-अप्रैल-2011 / समय : 11:35 रात्रि / घर



कविता : पेण्डूलम में बदले हुए लोग

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

झाबुआ............मध्य प्रदेश का एक जिला जोकि आदिवासी बहुल है और खुशकिस्मत इतना कि एक बड़े होते शहर के नजदीक मेरा मतलब आप भी समझ रहे होंगे कि मज़दूरी के लिये आसानी से उपलब्ध भीड़ जो कभी-कभी केवल एक जून भोजन के लिये भी वो सब कर सकती है जो कि इंसान(मुआफ कीजियेगा) नही कर सकते।


यह लोग होली के पर्व पर अपना एक त्यौहार "भगोरिया" मनाते हैं जोकि परंपरानुसार प्रणय-निवेदन का त्यौहार माना जाता है। शहरों में गये हुए यह लोग लौटते है तो महुआ की शराब, माँदल(एक प्रकार का वाद्य यंत्र ढोल नुमा) की लय पूरी रात नृत्य करते हैं और फिर लौट जाते हैं......शहर की ओर.....उम्मीदों के लिये...........

कविता : पेण्डूलम में बदले हुए लोग


इस,
फागुन में जब लौटगे वो
महुए,
अब भी उबाले जा रहे होंगे
देर रात तक
सुबह,
पहली धार से मिटाकर तड़प
मदमाती हो जायेगी
लाली फैल जायेगी होंठों से फिसलकर
गालों तक
यूँ लगेगा कि
सूरज कुछ देर के लिये ही सही
ठहर गया हो यहीं आस-पास
और ताक रहा हो
बौराये यौवन को फागुनी बयार में
भीगते / जलते हुये


मांदल की थाप पर
सनसनी दौड़ने लगी है देह में
बालियों में पक रहा है गेंहू /
यौवन संदली बदन में /
और मन में कई ख्वाब
रात लगती ही नही कि खत्म होगी कभी
होली की आँच में
गर्म हो रही होंगी कई हथेलियाँ मेहंदी रची हुई
और पसीना बस सरक रहा होगा
गर्दन से फिसलते हुये
सीने के करीब
या और थोड़ा नीचे....

बस,
यहीं खत्म होने लगेगा साथ
कुछ इंतजर के वादे /
या कुछ जल्द लौटने की मनुहारों के बीच
वो पकड़ लेगा अपनी राह
शहर की ओर
अभी जहाँ
जैसे धरती को अपने अक्ष से खोदना है उसे
दोनों ध्रुवों के बीच
और फिर खो जाना है
गुरूत्वाकर्षण को समझे बगैर
किसी झुग्गी या पाईप में
कि अब उसे शेष जिन्दगी बस
यूँ ही डोलते रहना है
किसी पेण्डूलम सा
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 25-अप्रैल-2011 / समय : 07:20 सायँ / ऑफिस लौटते

कविता : अण्णा रुके नही......

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

आज सुबह फेसबुक पर श्री समीरलाल जी की पोस्ट पढ़ी और फिर दिन भर श्री अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ़ चलाये जा रहे अभियान और की जा रही भूख हड़ताल ने विवश कर दिया यह सोचने को क्या भ्रष्टाचार का मुद्दा श्री अण्णा हजारे का कोई निजि मसला है क्या है (हम अक्सर ऐसा ही सोचते है)?

गाँधीजी के देश में ही अब लोग मानने लगे हैं कि हम क्यों औरों के फटे में पैर डाले? सबसे ज्यादा इस बात का दुःख है कि गाँधीजी के सिद्धाँतों में अब कोई विश्वास नही करता भूख हड़ताल(सच्ची तो अब कल्पनाओं में ही होगी कहीं), सत्याग्रह जैसे शब्द किसी अन्य भाषा के लगते हैं जिनका अर्थ कोई समझ ही नही पाता है......

श्री अण्णा हजारे के अभियान का हिस्सा बन सकूं/भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अपनी एक मोमबत्ती जला सकूं इसी भावना के साथ

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी
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मैनें,
यह मान लिया था
अब कोई बदलाव संभव नही है
व्यवस्था ने अपनेआप को ढाल लिया है
वो जो भी हो रहा है
आस-पास
और हम अभ्यस्त हो गये हैं
अपनी भूमिका से

किसी,
परिवर्तन का हिस्सा बनने का
माद्दा बचा ही नही है
सब मोम के बने
या तो पिघल जाते हैं
या ढाल लिये जाते है
जरूरतों ने कतरकर दुनिया समेट दी है
चार बाय पाँच इंच के जेब में
और साढ़े पाँच फुट का बेजुबान आदमी
नाचने लगा है उंगलियों पर

एक,
हाँका लगाने के बाद
अण्णा रुके नही
किसीका इंतजार करते
हमकदम होने का
बस चले पड़े अपनी राह बनाते हुए
किसी अचरज सा लगता है
एक आदमी.....आम आदमी
अपनी भूख से
उड़ा सकता है नींद
पेट भर खाये लोगों की
जिन्होंने अभी डकार भी नही ली है
खाने के बाद
और उनकी निगाहों में
देश में अभी काफी कुछ बाकी है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 07-अप्रैल-2011 / समय : 08:20 रात्रि / अहमद नगर प्रवास पर

कविता : सपनों का सैलाब

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

तुम,
जब अपनी मांग में
सवालों को सजा लेती हो तो
तुम्हारी आँखों में
तैरते सपने डूब जाते हैं
समन्दर में


तुम,
टाँक लेती हो जरूरतों को
जब अपनी साड़ी पर
और लपेट लेती हो तो
यूँ लगता है कि
जैसे आसमान लिपट आया हो
तुम्हारे बदन से
और तुम जरूरतों में घिरी
मुस्कुरा रही हो
चाँद की तरह


तुम,
जब उम्मीदों से
गूंथ लेती हो वेणी(गजरा)
और सजा लेती हो
अपने जूड़े में
तो यूँ लगता है कि
जैसे मुझे मिल गया हो
जीने का मक़सद
तुम्हारी उम्मीदों और जरूरतों के बीच
तुम्हारे सपनों का सैलाब
मुझे बहाए लिये जाता है
जिन्दगी की ओर
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 31-मार्च-2011 / समय : 09:45 रात्रि / घर लौटते हुए