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कविता : सपनों का सैलाब

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

तुम,
जब अपनी मांग में
सवालों को सजा लेती हो तो
तुम्हारी आँखों में
तैरते सपने डूब जाते हैं
समन्दर में


तुम,
टाँक लेती हो जरूरतों को
जब अपनी साड़ी पर
और लपेट लेती हो तो
यूँ लगता है कि
जैसे आसमान लिपट आया हो
तुम्हारे बदन से
और तुम जरूरतों में घिरी
मुस्कुरा रही हो
चाँद की तरह


तुम,
जब उम्मीदों से
गूंथ लेती हो वेणी(गजरा)
और सजा लेती हो
अपने जूड़े में
तो यूँ लगता है कि
जैसे मुझे मिल गया हो
जीने का मक़सद
तुम्हारी उम्मीदों और जरूरतों के बीच
तुम्हारे सपनों का सैलाब
मुझे बहाए लिये जाता है
जिन्दगी की ओर
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 31-मार्च-2011 / समय : 09:45 रात्रि / घर लौटते हुए

कविता : संवाद में ढ़लते हुये

गुरुवार, 24 मार्च 2011

विचार,
जब उठते हैं
मन में ज्वार की तरह
तो अपनी अनुगूंज से पैदा करते हैं
शब्द!
और विलीन हो जाते हैं
मन की गहराईयों में कहीं
छटपटाते हुये

शब्द!
जब जन्म लेता है तो
कुलबुलाता है दिमाग की तह में
और मचलता है
पैर पसारने को
अकेला शब्द जब कुछ नही कर पाता है तो
अपने ही हिस्से से पैदा करता है
शब्द कई टूटते-जुड़ते हुये ढ़ल जाता है
संवाद में
और तौड़ देता है
सारे मौन को
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 24-मार्च-2011 / समय : 02:20 दोपहर / लंच ब्रेक में

कविता : मैंने चुन रक्खे हैं पलाश

सोमवार, 14 मार्च 2011

एक
मेरे होने या न होने से
क्या फर्क पड़ेगा
न होली के रंग फीके होंगे
ना बेमजा हो जायेगा भीगने का आनन्द
फागुन वैसे ही आया है
कुछ देर से
भला अब कोई मुझे तलाशे /
मेरे लिये रूके / या भागते फिरे जंगल में
चीखते पलाश के पीछे
जिन्दा रहना यूँ भी आसान तो नही है
वो भी,
इन्सानी बस्ती में
एकबार जंगल होता तो......


मेरे,
लिये न कभी रात होगी जवाँ
न किसी सुबह सूरज
पूछेगा मुझसे निकलने के पहले
यद्दपि,
भिनसारे (मुँहअंधेरे) या गोधूलि (धुंधलके) में
तुम अपना चेहरा देखोगी
आईने में तो
मेरी शक्ल नज़र आयेगी
मैं,
तुमसे कोई सवाल नही करूँगा
लेकिन
मेरी चुप!
तुम बर्दाश्त नही कर पाओगी


मैं,
अब भी वहीं हूँ वैसा ही
सिर्फ एक बार
तुम मुझे दिल से याद करो
मैंने,
चुन रक्खे हैं पलाश
तुम्हारे ऊपर अपना रंग डालने को
एक बार तुम्हें
अपने रंग में रंगना चाहता हूँ
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 14-मार्च-2011 / समय : 1:40 दोपहर / ऑफिस(लंच ब्रेक)

कविता : वक्त की साजिशों......

गुरुवार, 3 मार्च 2011

जब,
पूरी काईनात
सूरज को परे धकेल रही होती है
अपनी जिन्दगी से
तब,
तुम्हारे हाथों को अपने हाथ में लिये
मुझे यह लगता है कि
तुम हँस पड़ोगी अचानक खिलखिलाकर
मेरी किसी बात पर
और इस शाम की बेवा होने के पहले
गोद भर जायेगी

सुबह,
की जल्दी मुझे तो नही थी
कम-अज-कम
सोचता हूँ कि
यह रात यूँ ही थमी रह जाये
सुबह के साथ
वक्त की साजिशों का असर होने लगेगा
तुम्हारी मखमली छुअन में उभरने लगेगीं खारिशें
और
मेरे पेट में आग

कभी,
यह सोचता हूँ कि
हम यूँ ही खोये रहे आस्माँ ताकते हुये
इस रात की अवधि को ही
बदलकर रख दें चौबीस घंटों में
और दिन को हिस्से को
यूँ ही खोया रहने दें
सूरज के ख्वाब बुनते
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 27-फ़रवरी-2011 / 11:15 रात्रि / घर

कुछ देर ठहरना चाहता हूँ

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

जब, तक हम साथ थे
उस एक रास्ते पर चलते हुये
मुझे हरपल लगता था कि
हम एकदूसरे के लिये ही बने है
शायद तुम भी,
ऐसा ही कुछ सोचती हो

न,
जाने मुझे ऐसा क्यों लगता था कि
मैं तुम पर थोप सकता हूँ
अपने विचारों को धूप की तरह /
तुम्हें घुले रख सकता हूँ
अपनी देहगंध में /
तुम पर अधिकार जता सकता हूँ
सिर्फ इस वज़ह से ही कि
हम साथ चल रहे हैं
और हमारे बीच पहचान बदलने लगी है
रिश्ते की सहूलियत में

मेरे,
विश्वास के परे
तुम किसी कोंपल की तरह
फूट पड़ीं और
अलग कर लिया खुद को
मेरी पहचान से मुक्त
मैं अब भी मुड़के देखता हूँ तो
तुम्हारे कदमों की छाप दिखाई देने लगी हैं
मेरे कदमों से अलग होती हुई
लेकिन रास्ता / दिशा अब भी एक ही है
मैं,
कुछ देर ठहरना चाहता हूँ
तुम्हारा इंतजार करते
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 03-फरवरी-2011 / समय : 11:27 रात्रि / घर

कविता : आदमी को पसीना नही आता है

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011


जबसे,
प्रबंधन(मैनेजमेन्ट) सिद्धाँत नही
बल्कि किसी हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगा है
और, आदमी ने सीखा
आऊटसोर्स/ऑफलोड़ करना और
खुदको मुक्त कर लेना
अपने कर्तव्यों से
तबसे,
आदमी! आदमी नही रहा

जब,
उसने सीखा था पढ़ना लिखना
तबसे,
आदमी नही रहा जंगली
जो अपनी सीमाओं का विस्तार करता था
अदम्य साहस के सहारे
और बदलकर रख देता था
जो भी चाहता था

अब,
आदमी अपने अधिकारों को बिजूकों में बदल
चौराहों पर खड़ा करता है
हक के लिये लड़ने
और खुद सो जाता है
दुबुक कर
अब,
आदमी को पसीना नही आता है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 29-जनवरी-2011 / समय : 07:45 सायं / बाहा-ईवेंट से लौटते हुये

गण, पैसा और तंत्र

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

आज,
फिर मना गणतंत्र दिवस
सुबह से ही रेडियो चीख रहे थे
मॉल्स में भारी छूट मिल रही थी
देशभक्तिं शीतलहर सी फैली हुई थी
स्कूलों से लड्डू खाये बच्चे लौट रहे थे
गण चौराहों पर बेच रहा था
एक रुपये में झंडा
जो कुछ देर तो जरूर हाथों में था
रस्मी तौर पर फिर.........


जिनके,
बाप के पास पैसे थे
उनके हाथ में झंड़े थे
तंत्र उनके साथ था
जिसके पास पैसा था
सुस्ता रहा था छुट्टी  की दोपहर
और बचा हुआ,
गण,
पैसे पैदा कर रहा था
झंड़े बेचकर /
घरों से कचरा फेंककर /
या बदल कर भीड़ में
एक जून की जुगत में
जिंदाबाद / जयहिन्द बोल रहा था
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : २६-जनवरी-२००९ / समय : ११:३० दोपहर / पलासिया चौराहे पर