महिला दिवस - विशेष
सोमवार, 8 मार्च 2021
कविता : ऊँचे कद के लोग
शुक्रवार, 15 मई 2020
औरतें
रविवार, 8 मार्च 2020
कविता : खेल
शनिवार, 29 फ़रवरी 2020
कविता : अमराई में बारूद
रविवार, 3 मार्च 2019
हाँ,
मैं भूल गया हूँ मुस्कुराना/
अपने से बातें करना/
कहकहे लगाना/
या तुम्हारे गेसुओं में फिराते उँगलियाँ
भूल जाना जीने की जिल्लत
जब से आम पर बौराई है बारुद
खलिहानों में उग आई हैं खंदकें
मैं,
दफ़्न हो गया हूँ
वहीं, जहाँ दिखा था
आखिरी बार मुस्कुराता
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मुकेश कुमार तिवारी
02-March-2019
@kavitaayan
कविता : बेमानी सन्दर्भ
रविवार, 25 नवंबर 2018
मेरे लिए
फिर नही लौटा
बयारो वाला मौसम
लाख चाहने पर भी
मिट्टी से नही उठी
सौंधी गमक
न ही इन्द्रधनुष खिंचा
वितान पर
नही आई ठिठुरन अबके
मेरी दालान में
धूप कन्नी काटती रही
आँगन से
किस अजीब से
मौसम को जी रहे हैं हम
सन्दर्भ सभी
बेमानी से हो आए हैं
अब आदमी की बात करो तो
जी धक्क सा करता है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : 25-नवम्बर-2018/समय : 18:55/इन्दौर-गुना यात्रा में
कविता : पड़ाव
शनिवार, 1 जुलाई 2017
करीब साढे नौ सालों के बाद अचानक फ़िर अपने ब्लॉग कि याद आई है.....
उम्र ने बढते हुये
द्दर्ज कर दी थी पेशानियों पे
अपनी मौजुदगी
और सफ़ेदी बढते हुये
कह ही दिया था
कि बहुत हो चुका सब
मन था कि
मानता ही नही
कभी यहाँ कभी वहाँ
अखबारों से शुरु हुआ सिलसिला
थमा तो व्हात्सएप पर
इस बीच पत्रिकायें थै तो
कभी फ़ेसबुक
लेकिन
छाँवभरी गोद लेकर
आज फ़िर याद आया है
ब्लॉग
किसी पड़ाव की तरह
एक थका देने वाली
जीवनयात्रा में
एक सुकून भरा ठहराव लिये....
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : 01-जुलाइ-2017 / समय : 04:40 दोपहर / घर
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
उम्मीदों की सलीब
रविवार, 28 अगस्त 2016
एक बोझिल सुबह
जिसमें समेटना है दिन का विस्तार
इसके पहले कि मायूसियाँ
शाम के साथ
लिपटने लगे पहलु के साथ
दौड़ना है दिनभर
काँधे पर टाँगें
उम्मीदों की सलीब ...
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक 28-अगस्त-2016/सुबह : 09:15/घर
कविता : पंख
मंगलवार, 3 सितंबर 2013
अपने पंखों को
अन्जान था
आकाश की गहराइयों से
बस
धरती के छोर पर ही
खत्म हो जाती थी
दुनिया मेरी
एक सुबह
आकाश ने रचे
मेरे लिए
तब कहीं जाके
मेरे पंखों ने लांघी
क्षमता की दहलीज
और समूचा
आकाश सिमट आया
मेरी उड़ान में
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०३-सितम्बर-२०१३ / १०:४० रात्रि / घर
कविता : उम्र के दोराह पर......
रविवार, 7 अप्रैल 2013
मैं
चाहता हूँ
फिर से खेलना
मिट्टी से बनाना घर
अपने सपनों का
और
रचना एक छोटी सी दुनिया......शांत
यहाँ
बहुत शोर है
और मोटी मोटी किताबें
होमवर्क / एक्जाम्स में फेल होने का खौफ़
बागीचे में
तितलियों के पीछे
या जमा करते हुए चिडियों के पंख
या बहुत दूर तक भागते हुए
किसी पतंग का पीछे करते
तो मेरा बचपन गुम हो रहा है
और बड़ा होकर क्या करना है
सामने खड़ा है
किसी यक्ष प्रश्न सा
इतना भ्रमित होता हूँ
इस दोराहे पर
अपने बचपन में
उन्हीं सुहाने दिनों में
अपनी कॉमिक्स की दुनिया में
दादा की उंगली पकड़
फिर से घूमता रहूँ
अपनी लॉन में और सीखता रहूँ चलना
अपने कदमों पर
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 17-नवम्बर-2012 / समय : 01:00 दोपहर / अमन खान के लिए
कविता : कल्पवृक्ष
शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013
नानी की कहानियों में
अक्सर सुना था
कल्पवृक्ष
और वो
मेरे
सपनों में सवार था तभी से
किसी दिन
मैं पा जाऊंगा उसे
अपनी सारी इच्छाएँ
पूरी कर लूंगा
ऐसे न जाने कितने सपने पाले
बड़ा हो गया
एक दिन
अब न तो कल्पवृक्ष है
न नानी
लेकिन अब भी
सपने हैं
इच्छाएँ हैं
और
विकल्प
की तलाश मौजूद है
शायद इनमें ही कहीं होगा
मेरा कल्पवृक्ष
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 22-जनवरी-2013 / समय : रात्रि 8:00 / राजश्री हास्पिटल
कविता : तुम्हारे हिस्से का वक्त
शनिवार, 20 अक्टूबर 2012
पूरे चैबीस घंटे थे
यदि मेरे बस में होता तो लिख देता
अपने हिस्से को भी
तुम्हारे नाम
और यह जद्दोजेहद
यहीं खत्म हो जाती
हमेशा के लिए कि
मेरे पास तुम्हारे लिए वक्त नही है
अपनी वज़हों के लिए
खामोशियाँ ही बचती है
जिन्हें तुम अक्सर
मेरी लाचारियों का नाम दे देती हो
और यही समझती हो
ऑफिस में
और कुछ नही होता
सिवाय लकीरों के पीटने के
यह वक्त का साँप
न जाने कब सरक आया है
तुम्हारे पास
और मैं लौटा हूँ
तुम्हारे हिस्से का वक्त
जाया करके
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 30-जुलाई-2012 / समय : 06:10 सुबह / घर
कविता : उम्मीद
बुधवार, 19 सितंबर 2012
बीच उम्मीदों का आस्माँ है
और हमें जोड़ता हुआ
इन्द्रधनुष
जिससे तुम चुनती हो
कोई चटक रंग अपनी पसंद का
और मेरे लिए धूसर
जिन्दगी में अब भी
शेष हैं रंग कई
और अंनत तक फैला हुआ
फासला
मैं बो देना चाहता हूँ
तुम्हारी प्रतीक्षा के बीज
इस छोर पे
और तुम्हें देने के लिए
एक उम्मीद
जो अब भी अशेष रह आई है जिन्दगी में
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 11-मार्च-2012 / समय : 04:40 दोपहर / घर
कविता : अपनी पहचान से परे
शनिवार, 11 अगस्त 2012
उस अशेष-शेष का
और कुछ भी नही
इससे ज्यादा
यहाँ तक कि
मेरा होना भी
तुम्हारे होने की वज़ह का
मोहताज है
और अलहदा भी करता है
ठीक वहीं से
जहाँ तुम पाते हो
अपने विचारों को गड्ड-मड्ड होते
और छोड़ देते हो
प्रश्नों को उलझे हुए धागों सा
या सिर्फ अपने बाप होने के
अहसानों से दबा देते हो
या मुझे सीने होते हैं
होंठ अपने
और गुम हो जाना होता है
अपनी पहचान से परे
तुम्हारी परछाइयों में कहीं
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 11-जुलाई-2012 / समय : 11:00 रात्रि / घर
कविता : आदमी के करीब रहते हुए
मंगलवार, 17 जुलाई 2012
जब तक मैं समझता रहा कि
केवल मुझे ही हक़ है
मुँह उठा के बोल देना का
कुछ भी / किसी को भी
बगैर यह देखे कि
मेरा सच उसके दिल को चीर के निकलेगा कहीं
या तोड़ देगा उसके विश्वास को
कि सच होता है, अब भी ?
धीरे-धीरे
मुझे, यह समझ आने लगा कि
सच!
अक्सर तकलीफ पहुँचाता है
अब, हर खुशी में तलाशता हूँ
झूठ पहले
या जब भी किसी ने कहा मेरे सामने
अपना सच!
मुझे धोखा हुआ है
आईने के सामने कि
मैं जो देख रहा हूँ वो सच! है?
और हर बार
मुझे यूँ लगा कि
आईना भी सीख गया है
झूठ बोलना
आदमी के इतने करीब रहने का
कुछ तो असर हुआ होगा
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 25-ऒक्टोबर-2011 / समय : रात्रि 12:05 / घर
कविता : इन्सान होना चाहता हूँ
सोमवार, 11 जून 2012
मुझे कोई रूचि नही होती कि
बेमतलब ही झाँकता रहूँ
आसमान में
और अपने आसपास
मंडराते बादलों से करूं बातें
ज़मीन की ज़मीन पर रहने वालों की
अब ज़मीन पर देखना
फिर खोजते रहना बस्तियों को
या दूर तक पीछा करना
सर्पिली सड़कों का
नही लुभाता है
चिकने पन्नों पर
पसरी जिंदगी की
खुरदरी कहानियाँ पढ़ना
या कुछ ऐसा जिसमें
हकीकत से कोसों दूर की दुनिया ने
रची हो एक दुनिया अपने लिए
सरसराहटें
या नसें खिंच रही चटकते हुए
तब बातें करना
उस अज़नबी से
जिसकी और मेरी दुनिया
बिल्कुल अलग है
और हम वक्त काटने के लिए
सिर्फ कर रहे हैं
बातें करना का उपक्रम
इस ऊँचाई से
भीगना चाहता हूँ
पसीने में
कुछ देर के लिए ही सही
फिर से इन्सान होना चाहता हूँ
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 08-मई-2012 / समय : 02:30 दोपहर / इन्दौर-मुम्बई जेट एयरवेज 9W-2022
कविता : शहर के चेहरे के इर्द-गिर्द
शुक्रवार, 11 मई 2012
मैं
आजतक नही समझ पाया हूँ
कि लोग
कैसे बचा लेते हैं
परपराओं को
और जीवित रखते हैं
अपने विश्वास को
जिंदगी से लड़ते हुए
वो
लोग
जिनके लिए
जिंदगी के मायने कई हद तक तो
सिर्फ एक सुबह को
एक दूसरी सुबह में बदल पाने की कोशिश के
अतिरिक्त और कुछ नही है
कैसे
वो समय निकाल पाते हैं
साँस लेने अलावा
अपनी परंपराओं के सहेजने के लिए
और भूल जाते हैं
अपने हिस्से का दुःख
भले ही कुछ पलों के लिए ही सही
ये लोग
जिनके अपने कोई वुज़ूद नही होते
राशनकार्ड से लगाकर वोटर लिस्ट तक में
न कोई नाम होता है
उन्हें कोई भी कुछ भी बुला सकता है
किसी भी नाम से
एक महानगर होने के स्थाईभाव की तरह
ये बगैर वुज़ूदवाले लोग जमे होते हैं
शहर के चेहरे के इर्द-गिर्द
पोषते हैं संस्कृति को
शहर को उसकी पहचान देते हुए
बदल जाते हैं
पॅवमैंट में किसी जन्म लेती मॉल के किनारे
और खो जाते हैं कहीं
किसी दिन
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 09-मई-2012 / समय : 06:18 शाम / कोयम्बटूर एयरपोर्ट के रास्ते पर एक धार्मिक यात्रा के करीब से गुजरते हुए