.post-body { -webkit-touch-callout: none; -khtml-user-select: none; -moz-user-select: -moz-none; -ms-user-select: none; user-select: none; }

गज़ल : सीने में उबलता तेज़ाब रख

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

मन में सुलगते जवाब रख
दिल में अपने हिसाब रख

वक्त का घोड़ा किस तरह दौड़े
पैरों में अपने रकाब रख

तेरी आँखें वो लोग पढ़ लेंगे
ख्वाबों पे अपने नकाब रख

मय क्या जो सुबह उतर जाये
इरादों में हौंसले की शराब रख

झूठ का गर्द चेहरा जर्द कर देगा
बातों में सच का हिज़ाब रख

किसी की आह जला ना दे तुझे
सीने में उबलता तेज़ाब रख

तलुआ चाटा कभी दुम हिलायी
इन्सां होने का कुछ तो रूआब रख
---------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : २३-सितम्बर-२००९ / समय : १०:५० रात्रि / घर

32 टिप्पणियाँ

Samay Balwaan ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है. 1 अक्तूबर 2009 को 2:14 pm
Mahfooz Ali ने कहा…

तलुआ चाटा कभी दुम हिलायी
इन्सां होने का कुछ तो रूआब रख.......

bahut hi sahi line.......... dil khush ho gaya.....

1 अक्तूबर 2009 को 2:21 pm
महफूज़ अली ने कहा…

तलुआ चाटा कभी दुम हिलायी
इन्सां होने का कुछ तो रूआब रख.......

bahut hi sahi line.......... dil khush ho gaya.....

1 अक्तूबर 2009 को 2:21 pm
sada ने कहा…

इन्सां होने का कुछ तो रूआब रख... बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

1 अक्तूबर 2009 को 2:33 pm
Pankaj Mishra ने कहा…

मस्त लिखा है आपने

1 अक्तूबर 2009 को 2:34 pm
ओम आर्य ने कहा…

ek se badhakar ek sher kahee hai aapane ........ek se badhakar ek samandar ki lahare hai .......bahuut bahut badhiyaa .....

1 अक्तूबर 2009 को 2:38 pm

तेरी आँखें वो लोग पढ़ लेंगे
ख्वाबों पे अपने नकाब रख
शे’र तो सभी बहुत अच्छे हैं. बहुत ही शानदार और दमदार गज़ल.

1 अक्तूबर 2009 को 2:51 pm
M VERMA ने कहा…

किसी की आह जला ना दे तुझे
सीने में उबलता तेज़ाब रख
यही वो तेजाब है जिसकी अनुपस्थिति मे आह जन्म लेता है. आह के खिलाफ़ जंग बहुत खूबसूरत है.
बहुत खूब

1 अक्तूबर 2009 को 3:22 pm

किसी की आह जला ना दे तुझे
सीने में उबलता तेज़ाब रख

सुन्‍दर खूबसूरत अभिव्‍यक्ति...

1 अक्तूबर 2009 को 5:27 pm
kshama ने कहा…

यही बात करना कितनी मुश्किल होती है ...एक घोडे को जब 10 दिशाओं में दौड़ा ने का यत्न होता है ..दौड़ना चहके भी वो एक ही जगह अटक जाता है ..घोडेसे कब पूछा जाता है की, वह किस दिशा में जाना चाहता है..?छोटा मुँह बड़ी बात कही हो तो, क्षमा को क्षमाकरें!

आपकी रचना बेहद दमदार तथा आशावादी है...इतना ज़रूर कहूँगी...!

1 अक्तूबर 2009 को 5:42 pm
वन्दना ने कहा…

तलुआ चाटा कभी दुम हिलायी
इन्सां होने का कुछ तो रूआब रख

bahut khoob likha hai..........har sher lajawaab hai.

1 अक्तूबर 2009 को 6:34 pm

तलुआ चाटा कभी दुम हिलायी
इन्सां होने का कुछ तो रूआब रख

---------
आप सफलता के एक शाश्वत सूत्र की अनदेखी कर रहे हैं! :)

1 अक्तूबर 2009 को 8:04 pm

kisi ki aah jala n de tujhe
sine me ubalta tejaab rakh.......
bahut hi gahraai se likha hai,yun bhi aapki har rachna lajawaab hoti hai

1 अक्तूबर 2009 को 8:21 pm
Mithilesh dubey ने कहा…

तलुआ चाटा कभी दुम हिलायी
इन्सां होने का कुछ तो रूआब रख.......

वाह क्या बात है, एक दम खरा कहा आपने।

1 अक्तूबर 2009 को 8:41 pm

wah,

antim sher gazab. bahut khoob badhaai.

1 अक्तूबर 2009 को 8:44 pm
Babli ने कहा…

बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! बहुत बढ़िया लगा!

2 अक्तूबर 2009 को 5:33 am

तिवारीजी,
आपने छोटी बहर की ग़ज़लों का मानक स्वरुप प्रस्तुत किया है ! किस शेर की दाद दूँ ? एक से बढ़कर एक--भावोद्वेलन को हसीन शब्दों में व्यक्त किया है आपने ! ये हिदायतें, ये शिकायतें और हुनरमंद बनाने ये नायाब नुस्खे आपके चिंतन का अलग-सा द्वार खोलते हैं !
लम्बे अरसे से कोशिश जारी है कि मजबूती से रख सकूँ रकाब पर पांव ! इंसां होने रुआब से लबरेज़ और सीने में उबलता तेजाब लिए तो जाने कब से भटक रहा हूँ ? सच कहूँ, दिल के बहुत करीब लगी ये ग़ज़ल !! बधाई भी, आभार भी !!
सप्रीत, --आ.

2 अक्तूबर 2009 को 8:39 am

तिवारीजी,
और ये कहना तो रह ही गया कि ख्वाबों पे नकाब रखना मेरे जैसे खुली तबीयत wale आदमी के लिए हमेशा से मुश्किल रहा है. आप कहते हैं तो अब ये कोशिश भी करूंगा !
सप्रीत, --आ.

2 अक्तूबर 2009 को 8:48 am
ज्योति सिंह ने कहा…

तेरी आँखें वो लोग पढ़ लेंगे
ख्वाबों पे अपने नकाब रख .
har sher laazwaab .aanand ji ki baate bhi dilchasp rahi .

2 अक्तूबर 2009 को 10:24 pm
Jogi ने कहा…
गुंजन ने कहा…

भाई,

मय क्या जो सुबह उतर जाये
इरादों में हौंसले की शराब रख

अपने जैसी ही बात कह रहा है, देखता हूँ रोज तुझे देर रात लौटते हुये।

तेरी आँखें वो लोग पढ़ लेंगे
ख्वाबों पे अपने नकाब रख

अच्छा लगा यह शे’र।

जीतेन्द्र चौहान

4 अक्तूबर 2009 को 10:41 am
शोभना चौरे ने कहा…

झूठ का गर्द चेहरा जर्द कर देगा
बातों में सच का हिज़ाब रख
ak se ak sher hai .lajvab .
kintu pag pag par jhuth ki hi satta chal rhi hai aur ashanti ki gunj ho rhi hai .
abhar

4 अक्तूबर 2009 को 5:18 pm
Arvind Mishra ने कहा…

वाह ! मन मुदित करती ,सधे शब्दों,अभिवयक्ति और भोगे यथार्थ से उपजे विवेक की कविता !

4 अक्तूबर 2009 को 7:50 pm
Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

मय क्या जो सुबह उतर जाये,
इरादों में हौसलों की शराब रख.

गज़ब ढा दिया मुकेश जी आपके इस शेर ने. सकारत्मकता का विलक्षण सन्देश और वह भी सिर्फ दो पंक्तियों में

नमन.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

5 अक्तूबर 2009 को 10:59 am
hem pandey ने कहा…

मय क्या जो सुबह उतर जाये
इरादों में हौंसले की शराब रख
- इस शराब के बूते बड़े से बड़े संकट का सामने किया जा सकता है.

5 अक्तूबर 2009 को 1:17 pm
Apoorv ने कहा…

तेरी आँखें वो लोग पढ़ लेंगे
ख्वाबों पे अपने नकाब रख

क्या बात है..ख्वाब भी आजकल स्विस अकाउंट नंबर से सीक्रेट होते जा रहे हैं..बहुत बेहतरीन अशआर

5 अक्तूबर 2009 को 10:37 pm
sandhyagupta ने कहा…

Is gazal ko padh kar pata chalta hai ki 'nagadon ki tarah bajte shabd' kise kahte hain.Shubkamnayen.

6 अक्तूबर 2009 को 10:55 pm

मेरे सखा नरेन्द्र सिँह सिकरवार की टिप्पणी जो मुझे ईमेल से प्राप्त हुई वो इस प्रकार है :-


Mukesh Bhiya

All shers have “wajan” but few are very heavy weight. Jamaane ki kaduvi sachhai ko bayan karte hain…

Tumhare kuch sheron me aag dikhti hai, ye aaj ke jamane ka darpan hai, jo logon ka asli chehara dikhata-sa lagta hai....

Main un sheron pr dil khol raha hoon…..


Sulagte jawaabon ke liye
Dahakte sawaal hone chahiye
Sawaal dil me jitni aag lagaega
Jawwaab utna hi agle ko sulgaega

Khwabon pe nakab ho to bhi padhne waale jaagti ankhon me khwab padh lete hain……

Khwan may ki chaahat me ankhon me aate hain, per unhe ashq peekar hi aankhon me palna padta hai...
Hosla ki sharab ka nasha utarte hi ye sach saamne aa jaataa hai...

Sach ka hizaab aajkal ke jamaane me itna jheena ho gaya hai, ki jhooth ki gard chhan-chhan kar baahar aati rahti hai... ye hi aajkal ki jhooth ki sachhai hai

Insaan itna swarthi hai ik use pata hai, kahan dum hilana hai, kahan talue chaatna hai... aaj insaan vo nahi raha, jo pehle hua karta tha... reedh ki haddi wala...

Dekha tha kabhi aadmi, fir so gaye the hum
Jaage to dekhte hain ki insaan badal gaya….


Expecting few more good gazals / poems in time to come……….

Regards
Pappu

narendra.sikerwar@avtec.in

7 अक्तूबर 2009 को 11:10 am

आप सभी का हृदय से आभारी हूँ!

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

7 अक्तूबर 2009 को 1:52 pm

तेरी आँखें वो लोग पढ़ लेंगे
ख्वाबों पे अपने नकाब रख

बहुत सुन्दर .ख्वाब छुपाने आने चाहिए न :)

मय क्या जो सुबह उतर जाये
इरादों में हौंसले की शराब रख

यही उम्मीद है जो ज़िन्दगी में आगे बढाए रखती है ..बहुत सुन्दर लगी आपकी यह गजल .देर से पढ़ पायी इस के लिए माफ़ी ..

7 अक्तूबर 2009 को 3:22 pm

तेरी आँखें वो लोग पढ़ लेंगे
ख्वाबों पे अपने नकाब रख

हर एक शेर लम्बी कहानी सिमटे हुवे है ........ लाजवाब एहसास है ......... कमाल के शेर हैं सब .........

8 अक्तूबर 2009 को 12:12 am

बेहतरीन ... मुकेश भाई !
शुभकामनायें !

14 अक्तूबर 2009 को 10:43 am