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गज़ल : जज्बात भरी कहानी छोड़

सोमवार, 21 सितंबर 2009

कुछ अपनी शैतानी छोड़
कुछ अपनी हैवानी छोड़

आपाधापी बहुत हो चुकी
कोई शाम सुहानी छोड़

चिंता किसकी मिटी जहाँ में
इक उजली पेशानी छोड़

कौन बदल पाया है नसीबा
जिद अपनी बेमानी छोड़

रेत समय की क्या लिक्खूं
हसरत भरी जवानी छोड़

एक दिन तुझको भी जाना है
अपनी कोई निशानी छोड़

बेदिल दुनिया रह जायेगी
जज्बात भरी कहानी छोड़

दुनिया किसके साथ मरी है
तू अपनी नादानी छोड़
----------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : १५-सितम्बर-२००९ / समय : ११:२० रात्रि / घर

33 टिप्पणियाँ

एक दिन तुझको भी जाना है
अपनी कोई निशानी छोड़

बहुत सुन्दर !!!

21 सितंबर 2009 को 11:15 am
Pankaj Mishra ने कहा…

वाह वाह खूब कही आपने
कौन बदल पाया है नसीबा
जिद अपनी बेमानी छोड़

21 सितंबर 2009 को 11:38 am
Mithilesh dubey ने कहा…

वाह-वाह बहुत ही सटिक कहा है आपने। लाजवाब प्रस्तुति। बधाई

21 सितंबर 2009 को 11:52 am
raj ने कहा…

achhi rachna....एक दिन तुझको भी जाना है
अपनी कोई निशानी छोड़ ...

21 सितंबर 2009 को 12:07 pm

कौन बदल पाया है नसीबा
जिद अपनी बेमानी छोड़ ,

सुन्दर प्रस्तुति बधाई!!!!

21 सितंबर 2009 को 12:37 pm

मेरे सखा नरेन्द्र सिँह सिकरवार ने भी ई-मेल के माध्यम से प्रस्तुत गज़ल पर अपनी प्रतिक्रिया जो भेजी है वह आपके समक्ष प्रस्तुत है :-

Good gazal……

Vo sab kuch chhodne ko kah rahe ho… jo insaan chhodna nahi chata… Shaitani, Haiwani, Aapadhapi, Jid vagerah---vagerah….

The best one I liked is:

Ek din tujhko bhi jaanaa hai, Apni koi nishani chhod

And:

Dunia kiske saath mari hai, too apni nadanichhod

Wah, maja aa gaya...

Main bhi kuch kahta hoon....

Pehchaan rahe kaayam
kuch to nishani rakh jaa,
Ek chiraag mere dar pe
baa-meharbaani rakh jaa
Teri yaad jehan me bani rahe
Harik mod pe apni kahani rakhjaa


Meri ye gujarish hai
Tum sada aise hi likhte raho
Jab bhi main jhaakoon kavitayan me
Tum, bus tum hi vahan dikhte raho….



Tumhara Ye Safar Hamesha Jaari Rahe!!!!


Narendra Singh Sikerwar
narendra.sikerwar@avtec.in

21 सितंबर 2009 को 2:49 pm
M VERMA ने कहा…

कौन बदल पाया है नसीबा
जिद अपनी बेमानी छोड़,
बहुत खूबसूरत, बेहतरीन

21 सितंबर 2009 को 4:07 pm
ओम आर्य ने कहा…

कुछ अपनी शैतानी छोड़
कुछ अपनी हैवानी छोड़
बेहद गहरी भाव लिये हुये ........

एक दिन तुझको भी जाना है
अपनी कोई निशानी छोड़

जीवन दर्शन .........जो मुक्ति का मार्ग दिखाती हुई प्रतित हो रही है .......

दुनिया किसके साथ मरी है
तू अपनी नादानी छोड़

दुनियादारी सिखाती पंक्तियाँ ......


आपकी रचनाओ की दायरा बहुत ही बडा है ......ऐसे ही लिखते रहे .......सादर

21 सितंबर 2009 को 6:34 pm
Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

कौन बदल पाया है नसीबा
जिद अपनी बेमानी छोड़

छोटे बहर की बेमसल ग़ज़ल.
हार्दिक बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

21 सितंबर 2009 को 7:15 pm
kshama ने कहा…

Harek pankti behtareen..kin,kin ko dohraun?

21 सितंबर 2009 को 8:16 pm

baat to kai baar hoti hai aapse , aur aapki har post bhi padhta hoon par comment aaj kar pa raha hoon aap to jante hi hain office main cpomment karna sambhav nahi...

"एक दिन तुझको भी जाना है
अपनी कोई निशानी छोड़ "

bahut badhiya...
...kabhi dilli main apni nishani bhi chor dete....
...busa vaada hi kiya aapne...
aor haan ek baat aur mera naam 'Darpan' hai 'Dinesh' nahi. HAHAHAHA

21 सितंबर 2009 को 8:31 pm

प्रभावशाली अंदाजे बयां है आपका, शुभकामनायें !

21 सितंबर 2009 को 10:17 pm
BrijmohanShrivastava ने कहा…

,मै आदेशानुसार तो लिख नहीं पा रहा हूँ क्योंकि ये उम्र बीच में आड़े आरही है ,हो सकता है बचपन में बुजुर्गों के ज्यादा पैर छुए हों और उन्होंने "आयुष्मान भव" दीर्घजीवी भव " आदि के आशीर्वाद दिए हों ,मगर
मुसीबत
मुसीवत और लम्बी जिंदगानी
बुजुर्गों की दुआ ने मार डाला
खैर आपके निर्देशानुसार मैंने बराहा डाउन लोड कर लिया है और अब उसमें हिन्दी सेव हो जाती है मगर उसमे अंग्रेजी का कोई अक्षर लिखता हूँ तो न जाने कौन सी भाषा में वे अक्षर परिवर्तित हो जाते है |एक समस्या तो हल हुई लेकिन में किसी के ब्लॉग पर जाता हूँ तो उसे पढ़ नहीं पाता (किसी किसी ब्लॉग में दिक्कत हो रही है उसका हल और बतलादें वहां वही ()()()()()दिखती हैं |

एक दिन जाना है अपनी कोई निशानी छोड़ ,और चिंता किसकी मिटी जहाँ में ( चिंता सापिन काह न खाया ,को जग जाहि न व्यापी माया )दुनिया किसके साथ मरी है सच बात है और नसीब कौन बदल पाया है ( तुम सन मिटहिं कि विधि के अंका,मातु व्यर्थ जनि लेहु कलंका ")बहुत प्यारी ,सांसारिक और आध्यात्मिक रचना

21 सितंबर 2009 को 10:23 pm
ज्योति सिंह ने कहा…

एक दिन तुझको भी जाना है
अपनी कोई निशानी छोड़ .
bahut khoob .umda .

22 सितंबर 2009 को 1:25 am

तिवारीजी,
आपकी छोटी बहर की ये ग़ज़ल जीवन-दर्शन के अनेक रंग ले आयी है ! अद्भुत और सार्थक रचना है ! सीधी, सच्ची और बेलाग बात, बिना मिर्च-मसाले के--अंतर तक जाती हुई, असर छोड़ जाती है. शब्दों के रंधन-कर्म में आप सिद्धहस्त हैं, यह तो जानता ही हूँ ! एक-एक मिश्रा बिना घोटे गुटक जाने को जी चाहता है ! बधाई !
सप्रीत...आ.

22 सितंबर 2009 को 1:57 am
Udan Tashtari ने कहा…

छोटी बहर में पूरी बात कही है और बहुत खूब निभाया है. छोटी बहर में अपनी पूरी बात कह जाना आसान नहीं. आपको बहुत बहुत बधाई.

22 सितंबर 2009 को 2:41 am

"एक दिन तूने भी जाना है
अपनी एक निशानी छोड़ "
आनंद आगया आपकी रचना में मुकेश भाई ! मेरी हार्दिक शुभकामनायें

22 सितंबर 2009 को 11:03 am

चिंता किसकी मिटी जहाँ में
इक उजली पेशानी छोड़
SACH HAI... HAR KISI KO MUSKURA KAR MILNA HI JEEVAN HAI ....

कौन बदल पाया है नसीबा
जिद अपनी बेमानी छोड़
SAMAY KE SAATH BAHNA HI JEEVAN HAI ... JO MILE VAHI NASEEB BANA LENA CHAAHIYE ... KAMAAL KA SHER HAI ...

एक दिन तुझको भी जाना है
अपनी कोई निशानी छोड़
BAHOOT KHOOB ..... IS SHER MEIN NICHOD HAI JEEVAN KA ....

22 सितंबर 2009 को 2:14 pm

दुनिया किसके साथ मरी है
तू अपनी नादानी छोड़

सही सच कहा आपने बहुत ही सुन्दर gajal कही है आपने ..behad pasand aayi यह

22 सितंबर 2009 को 3:51 pm

बहुत सरल और बहुत सुन्दर। मैं तो मोह गया पंक्तियों से!

22 सितंबर 2009 को 4:00 pm
गुंजन ने कहा…

भाई,

रेत समय की क्या लिक्खूं
हसरत भरी जवानी छोड़

बेदिल दुनिया रह जायेगी
जज्बात भरी कहानी छोड़

बहुत अच्छे शे’र कहें है, किसी दिन सुनाओ यार मजा दोगुना हो जायेगा।

जीतेन्द्र चौहान

22 सितंबर 2009 को 7:45 pm
Apoorv ने कहा…

आपाधापी बहुत हो चुकी
कोई शाम सुहानी छोड़

दिल बेचैन हो उठता है इस शेर को पढ़ कर..

..और इन पंक्तियों का क्या कहूँ..बस..
रेत समय की क्या लिक्खूं
हसरत भरी जवानी छोड़
बार बार पढ़ने का दिल करता है आपकी इस खूबसूरत ग़ज़ल को..शब्दों का इतना किफ़ायती प्रयोग कोई आप से सीखे.

22 सितंबर 2009 को 8:16 pm
Ulook ने कहा…

दुनिया किसके साथ मरी है
तू अपनी नादानी छोड़

-------------------
कभी कभी लगता है शायद कोई और भी सांथ
में मरेगा
-----------------------

बहुत सुन्दर

22 सितंबर 2009 को 10:03 pm

एक दिन तुझको भी जाना है
अपनी कोई निशानी छोड़ ......
kuch to yaad rah jaye aanewale pal mein

22 सितंबर 2009 को 10:49 pm
Ravi Srivastava ने कहा…

आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है। सच में जिंदगी की भाग-दौड़ में से कुछ सुहाने पल अवश्य चुराना चाहिए. बहुत सुन्दरता पूर्ण ढंग से भावनाओं का सजीव चित्रण... आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी, बधाई स्वीकारें।

आप के द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं मेरा मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन करती हैं। आप मेरे ब्लॉग पर आये और एक उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दिया…. शुक्रिया.
आशा है आप इसी तरह सदैव स्नेह बनाएं रखेगें….

23 सितंबर 2009 को 10:42 am

bahut lazavaab gazal he bhai/
ruhani..soofi andaaz aour darshan yukt/
kya baat he/
एक दिन तुझको भी जाना है
अपनी कोई निशानी छोड़
lagta he is tarah hi nishaani chhori jaa sakati he/ gazab/
दुनिया किसके साथ मरी है
तू अपनी नादानी छोड़
in panktiyo ne to sabkuchh kah diya/ ab rahaa hi kya///waaaaaaaaah/ rah gayaa he to bas waah-waah karnaa hi/

23 सितंबर 2009 को 5:50 pm

जीवन का मर्म बता दिया है आपने इस कविता के सहारे |

23 सितंबर 2009 को 10:12 pm
श्यामल सुमन ने कहा…

मुकेश भाई - बहुत बेहतरीन रचना। बहुत आसानी से इस छोटे बहर की गजल में आपने बहुत कुछ कह दिया। बधाई।

24 सितंबर 2009 को 10:34 am

दुनिया किसके साथ मरी है
तू अपनी नादानी छोड़ ||

वाह्! जीवन दर्शन सिखाती लाजवाब गजल्...
मेरे जैसा कविता/गजल इत्यादि की बिल्कुल भी समझ न रखने वाला इन्सान भी जब मंत्रमुग्ध होकर पूरी की पूरी रचना शुरू से आखिर तक कईं बार पढे तो आप खुद ही अन्दाजा लगा लीजिए कि वो रचना कितनी लाजवाब होगी....
बहुत ही उम्दा!!

25 सितंबर 2009 को 1:23 am
Babli ने कहा…

मुझे तो इस बात पर आश्चर्य लग रहा है आखिर मुझ पर ऐसा घिनौना इल्ज़ाम क्यूँ लगाया गया? मैं भला अपना नाम बदलकर किसी और नाम से क्यूँ टिपण्णी देने लगूं? खैर जब मैंने कुछ ग़लत किया ही नहीं तो फिर इस बारे में और बात न ही करूँ तो बेहतर है! आप लोगों का प्यार, विश्वास और आशीर्वाद सदा बना रहे यही चाहती हूँ!
बहुत ही ख़ूबसूरत और शानदार रचना लिखा है आपने! बधाई!

25 सितंबर 2009 को 7:30 am

आप सभी का आभार!!!!

आपके विचार और टिप्पणियाँ मुझे मार्गदर्शन देते हैं और अच्छा करने को प्रेरित भी।

स्नेह बनाये रखियेगा।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

25 सितंबर 2009 को 6:39 pm
Acharya Kishore Ji ने कहा…

koi to nishani chod .....bhai waah !

25 सितंबर 2009 को 7:55 pm

wah wah, bahut behatareen rachna, badhaai.

27 सितंबर 2009 को 5:33 am