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गज़ल : वो जब भी मुझे देखता है

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

जरूर कुछ ना कुछ तो कहीं जलता है
आँखें मसलता है वो जब भी मुझे देखता है

दर-ओ-दीवार पीते हैं कोहराम रात-दिन
इक समंदर मेरे घर से होकर गुजरता है

फासले अब भी दरम्याँ हैं बहुत
वो गुंजाईश रखकर ही गले मिलता है

उसकी चिट्ठियाँ अब भी रुला देती हैं मुझे
ना जाने कौन सी स्याही से खत लिखता है

किसी अज़ाब से कम नही है इन्सान
मौसम के हिसाब से चेहरा बदलता है

तू भी तलाश ले अपनी राह "मुकेश"
भला यहाँ कौन किसके लिये ठहरता है

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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०१-सितम्बर-२००९ / समय : ११:१५ रात्रि / घर

29 टिप्पणियाँ

M VERMA ने कहा…

उसकी चिट्ठियाँ अब भी रुला देती हैं मुझे
ना जाने कौन सी स्याही से खत लिखता है
======
जो होता नही शायद वही अब दिखता है
यकीनन वो दिल की स्याही से खत लिखता है
बेहतरीन
बहुत खूब

3 सितंबर 2009 को 7:28 pm
अनिल कान्त : ने कहा…

भाई वाह मजा आ गया

3 सितंबर 2009 को 7:28 pm

Mukesh ji,Bahut hi umda gazal hai ek ek shabd dil jeet lete hai..
badhayi!!

3 सितंबर 2009 को 7:33 pm
एकलव्य ने कहा…

भावपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति .

3 सितंबर 2009 को 7:41 pm

फासले अब भी दरम्याँ हैं बहुत
वो गुंजाईश रखकर ही गले मिलता है

बहुत खूब ...

किसी अज़ाब से कम नही है इन्सान
मौसम के हिसाब से चेहरा बदलता है

यह बात बिलकुल सही कही आपने यह अंदाज भी बहुत भाया आपके लिखने का मुकेश जी

3 सितंबर 2009 को 7:54 pm
Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

किसी अज़ाब से कम नही है इन्सान
मौसम के हिसाब से चेहरा बदलता है

सत्य वचन. सुन्दर मनमाफिक ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

3 सितंबर 2009 को 7:59 pm
AlbelaKhatri.com ने कहा…

बहुत ख़ूब ..........
उम्दा ग़ज़ल !

3 सितंबर 2009 को 8:00 pm
Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन रचना!

3 सितंबर 2009 को 9:01 pm

तिवारीजी,
आपकी कविता हो या ग़ज़ल, उससे गुजरना हमेशा सुखद होता है. इस ग़ज़ल की कतिपय पंक्तियाँ तो अंतःकरण को झिंझोर देती हैं :
फासले अब भी दरम्याँ हैं बहुत
वो गुंजाईश रखकर ही गले मिलता है ...
उसकी चिट्ठियाँ अब भी रुला देती हैं मुझे
ना जाने कौन सी स्याही से खत लिखता है ...
किसी अज़ाब से कम नही है इन्सान
मौसम के हिसाब से चेहरा बदलता है...

भाई, अपनी भावनाओं से परेशान हूँ,.. 'कतिपय पंक्तियाँ' लिख तो गया, लेकिन आपकी पंक्तियाँ उद्धृत करने लगा तो लगा कि पूरी ग़ज़ल ही फिर लिख देनी पड़ेगी... अति सुन्दर,.. मन मयूर नाचा.. सप्रीत.. आ.

3 सितंबर 2009 को 9:14 pm
vikram7 ने कहा…

दर-ओ-दीवार पीते हैं कोहराम रात-दिन
इक समंदर मेरे घर से होकर गुजरता है
बेहतरीन भावपूर्ण रचना

3 सितंबर 2009 को 9:31 pm
ओम आर्य ने कहा…

उसकी चिट्ठियाँ अब भी रुला देती हैं मुझे
ना जाने कौन सी स्याही से खत लिखता है

samwedansheel rachana jindgi ke karib lagi .......kamaal ke likhate hai aap.......behad khubsoorat

3 सितंबर 2009 को 9:52 pm
pallavi trivedi ने कहा…

दर-ओ-दीवार पीते हैं कोहराम रात-दिन
इक समंदर मेरे घर से होकर गुजरता है

बहुत बढ़िया..अच्छी लगी ये ग़ज़ल!

3 सितंबर 2009 को 10:30 pm
गुंजन ने कहा…

भाई,

फासले अब भी दरम्याँ हैं बहुत
वो गुंजाईश रखकर ही गले मिलता है

ऐसा हम तो नही करते हैं ना?

बहुत अच्छे लगे सभी शे’र तेरी इस गज़ल के।

जीतेन्द्र चौहान

4 सितंबर 2009 को 3:08 pm

आदमी क्या है, चेहरा या अन्दर और कुछ? उसे तलाशना ही जिन्दगी भर का प्रॉजेक्ट है!

4 सितंबर 2009 को 5:09 pm

बहुत खूब... उम्दा ग़ज़ल

4 सितंबर 2009 को 6:40 pm
विनय ‘नज़र’ ने कहा…

उसकी चिट्ठियाँ अब भी रुला देती हैं मुझे
ना जाने कौन सी स्याही से खत लिखता है

बहुत बढ़िया ग़ज़ल का एक उम्दा शे'र, वाह-वा!

5 सितंबर 2009 को 2:21 am
Nirmla Kapila ने कहा…

मुकेश जी पूरी गज़ल ही लाजवाब है समझ नहीं आरहा किस शेर के बारे मे कहूँ मगर ये शेर अद्भुत,कमाल हैं
उसकी चिट्ठियाँ अब भी रुला देती हैं मुझे
ना जाने कौन सी स्याही से खत लिखता है
फासले अब भी दरम्याँ हैं बहुत
वो गुंजाईश रखकर ही गले मिलता है
किसी अज़ाब से कम नही है इन्सान
मौसम के हिसाब से चेहरा बदलता है
इस सुन्दर गज़ल के लिये बहुत बहुत बधाई

5 सितंबर 2009 को 8:25 am

प्रतिक्षारत तुलसी के बाद आपकी गज़ल। माशाअल्लाह आप तो जनाब इस विधा में भी माहिर हो रहे हैं। या यूं कहूं कि माहिर हैं।
"किसी अज़ाब से कम नही है इन्सान
मौसम के हिसाब से चेहरा बदलता है"
इस शे'र में दुनियाई हक़ीकत का स्पष्ट अक़्स है।
"तू भी तलाश ले अपनी राह "मुकेश"
भला यहाँ कौन किसके लिये ठहरता है"
एक बात है जीवन दर्शन की- ठहरना सम्भव नहीं। जो ठहर गया, समझो खत्म हो गया। सभी अपनी राह तलाश रहे हैं, कोई ठहरता नहीं। जब उम्र खुद अपनी, अपने से दगा देती है तो किसी की क्या फिक्र? किंतु आपका शे'र सुकून देता है, आस देता है।
"उसकी चिट्ठियाँ अब भी रुला देती हैं मुझे
ना जाने कौन सी स्याही से खत लिखता है"
वाह, बहुत खूब लिखा। दिल की स्याही है, आंखों से आंसू बन कर कागज़ पर उतरती है।
मज़ा आ गया जी, आप्की गज़ल में।

5 सितंबर 2009 को 4:46 pm

"किसी अज़ाब से कम नही है इन्सान
मौसम के हिसाब से चेहरा बदलता है
तू भी तलाश ले अपनी राह "मुकेश"
भला यहाँ कौन किसके लिये ठहरता है"
ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं...बहुत बहुत बधाई...
बहुत सुन्दर रचना....बहुत बहुत बधाई....

5 सितंबर 2009 को 9:37 pm
hem pandey ने कहा…

'किसी अज़ाब से कम नहीं है इन्सान
मौसम के हिसाब से चेहरा बदलता है.
- फितरती इंसान की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत की है आपने.

6 सितंबर 2009 को 7:28 pm
Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

किसी अज़ाब से कम नही है इन्सान
मौसम के हिसाब से चेहरा बदलता है .
Bahut sunder hain sare sher par ye khas hai.

6 सितंबर 2009 को 8:12 pm

फासले अब भी दरम्याँ हैं बहुत
वो गुंजाईश रखकर ही गले मिलता है

उसकी चिट्ठियाँ अब भी रुला देती हैं मुझे
ना जाने कौन सी स्याही से खत लिखता है

VAAH ITNE KAMAAL KE SHER KAHE HAIN MUKESH JI ....... HAR SER MEIN SUBHAAN ALLA KAHNE KO MAN KARTA HAI ... BHAAVNAAON KO UDEL DIYA HAI AAPNE IN DONO SHER MEIN ........LAJAWAAB

7 सितंबर 2009 को 1:15 pm
Atmaram Sharma ने कहा…

बहुत बढ़िया. खासकर -
ना जाने कौन सी स्याही से खत लिखता है,

7 सितंबर 2009 को 2:37 pm
अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत खूब! कविताओं के बाद अब गजल में भी खूब जमे! जमाये रहिये।

7 सितंबर 2009 को 10:37 pm
भूतनाथ ने कहा…

बस इसीलिए तो रुक गया कि अश-आर तिरे लगे अच्छे....
वगरना तो ये भूत कहीं पर कम ही ठहरता है.......!!

7 सितंबर 2009 को 11:30 pm

मेरे सखा नरेन्द्र सिँह सिकरवार की प्रतिक्रिया निम्न प्रकार से थी जोम कि मुझे ई-मेल से प्राप्त हुई है :-

Hi Mukesh,

It is a change of taste…. After so many poems you switched over to a gazal…. a simply marvelous outcome….

Nice one…

Insaan azaab he to hai…. Ek se jyaadaa moukon par saabit ho chukka hai jindagi mein… chaahe ye marela ho ya chaahe vo marela ho... mouke pe hi yaad karte hain….

Insaan ko faqat azaab rahne do, ek anjaana-sa khwaab rahne do
Mat lo itne imthehaan uske, utar jaaegaa chehro ka aab, rahne do


Faasle darmiyan ab bhi bahut hai…... good sher...

Mile to the vo humse par dil mein dabi farmaaishen rah gayeen
Kareeb hokar bhi door hi rahe, thodi-si gunjaaishen rah gayeen


Dar-o-deewar peete hain……

Ye sher bhi achha hai, kintu nakaratmak bhawnaaon kao vyakt karta hai…. Koshish karo ki eise sher kam hi dale jaaen gazal mein....

Uski chiththiyaan......

Very romantic one .... indicates endless love with someone…..

Tub hi talaash kar le….

Ek udaas sher... jaise anishit si jindgi ko anjaan si raahon sao koi awaaz de raha ho, apne saath le jaane ke liye.. very touching, good one...

OVERALL, THIS GAZAL IS REAYY VERY BEAUTIFUL.....


Keep it up!!!!

Narendra Sikerwar
narendra.sikerwar@avtech.in

8 सितंबर 2009 को 3:21 pm

प्रिय गुरूजनो, साथियों,

आप सभी के स्नेह और मार्गदर्शन का आभार और आपकी सराहना के लिये दिल से शुक्रिया।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

8 सितंबर 2009 को 7:43 pm

बेहतरीन । बहुत सुन्दर ।

11 सितंबर 2009 को 10:10 am
श्रीश प्रखर ने कहा…

बेहद प्यारी सीधी और उम्दा गजल ......वाकई ..

16 सितंबर 2009 को 9:45 am